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BLACK HOLE में सूर्य की किरण नहीं पहुंचती, फिर प्रकाश कहां से आता है, प्रोफेसर अमित शुक्ला ने पता लगाया

अंतरिक्ष में करोड़ों रहस्य भरे हुए हैं। ब्लैक होल एक ऐसा रहस्य है जिस का पता लगाने की कोशिश दुनिया के सभी अंतरिक्ष वैज्ञानिक करते हैं। आधुनिक विज्ञान के लिए ब्लैक होल सबसे बड़ी चुनौती है। मध्य प्रदेश के IIT INDORE में सेवाएं दे रहे हैं प्रोफेसर अमित शुक्ला ने ब्लैक होल के एक रहस्य का पता लगा लिया है। डिपार्टमेंट ऑफ एस्ट्रोनॉमी, एस्ट्रोफिजिक्स और स्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अमित शुक्ला ने एक अन्य संस्थान के प्रोफेसर के साथ मिलकर इस खोज पर आधारित रिसर्च पेपर तैयार किया है। दुनिया के श्रेष्ठ रिसर्च जर्नल में से एक नेचर कम्युनिकेशन ने इस पेपर को प्रकाशित किया है।

ब्लैक होल क्या है, इसके अंदर क्या होता है 

अंतरिक्ष में ब्लैक होल एक शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र वाली जगह है जहां पर भौतिक विज्ञान का कोई भी नियम काम नहीं करता है। ब्रह्मांड में यूं तो कई ब्लैक होल हैं लेकिन वे सभी पृथ्वी से हजारों प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित हैं। यदि ये पास होते तो पृथ्वी को निगल गए होते और मनुष्यों का नामोनिशान तक नहीं रहता। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ये होल बनते कैसे हैं? दरअसल, वैज्ञानिक तौर पर ऐसा माना जाता है कि जब कोई विशाल तारा अपने अंत की ओर पहुंचता है तो वह धीरे-धीरे ब्लैक होल में बदलने और आसपास की सारी चीजों को अपनी ओर खींचने लगता है। इसका खिंचाव इतना ज्यादा शक्तिशाली होता है कि इससे कुछ नहीं बच सकता। यहां तक कि एक बार ब्लैक होल के अंदर प्रकाश भी चला जाए तो वो फिर कभी बाहर नहीं आ सकता।

होल में इलेक्ट्रॉन-चुम्बकीय क्षेत्र के कारण पैदा होती है ऊर्जा

प्रोफेसर शुक्ला ने बताया कि ब्लैक होल अधिकांश आकाश गंगाओं का मध्य ब्लैक होल कहलाता है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस ब्लैक होल में प्रकाश की किरणों को देख चुके हैं, लेकिन ये किरणें कहां से आती हैं या इनकी ऊर्जा का स्त्रोत क्या है? ये अभी तक कोई नहीं जान पाया था। हमने अपने ‘शोध में पता लगाया है कि इलेक्ट्रॉन और चुम्बकीय क्षेत्र के कारण ऊर्जा पैदा होती है जो प्रकाश तरंगों के समान नजर आती हैं। अपने शोध में प्रोफेसर शुक्ला ने क्वासर 3सी 27 ब्लैक होल का अध्ययन किया है।

दुनिया का श्रेष्ठ जनरल है नेचर मैग्जीन

डॉ. अमित शुक्ला ने बताया, दुनियाभर में रिसर्च पेपर प्रकाशित करने वाले जर्नल्स को उनके इम्पैक्ट फैक्टर के माध्यम से महत्व दिया जाता है। नेचर कम्युनिकेशंस का इम्पैक्ट फैक्टर 12.12 जो कि नेचर मैग्जीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। नेचर मैग्जीन और नेचर कम्युनिकेशन एक ही पब्लिशिंग हाउस के जर्नल हैं।

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