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मुख्यमंत्री की कुर्सी में एक पाया थोड़ा बड़ा लगा दिया है / MY OPINION by pravesh singh Bhadouriya

किसी राज्य का मुख्यमंत्री यदि अपनी सुविधानुसार मंत्रीमंडल गठित ना कर पा रहा हो और जैसे-तैसे मंत्री बना दिये जाये लेकिन विभाग बंटवारे में भी मुख्यमंत्री की नहीं चले तो उस राज्य का भविष्य क्या होगा? 

इसी बीच "नायक" फिल्म का एक डायलॉग याद आ रहा है जो मध्यप्रदेश की वर्तमान राजनीति पर एकदम सटीक है। "जब फिल्म में दंगा हो रहा होता है तब एक पुलिस अधिकारी फिल्म में मुख्यमंत्री से बात कर रहे होते हैं और मुख्यमंत्री ये कहकर कार्रवाई करने से मना कर देते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के चारों "पाये" उनके नहीं है बल्कि अलग-अलग वर्ग के लोगों के हैं जिन्होंने उन्हें कुर्सी पर बैठाया है। एक भी "पाया" खिसका तो कुर्सी गिर जायेगी।"

यही हालत मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार की लग रही है लेकिन यहां एक "पाया" थोड़ा बड़ा लगा दिया गया है जिससे कुर्सी लड़खड़ा भी रही है। अर्थशास्त्र में "फ्रेडरिक हायेक" के "स्वतंत्र बाजार" की परिकल्पना के अनुसार जो बाजार दूसरों के हस्तक्षेप से स्वतंत्र हो, वे हमेशा बेहतर काम करते हैं। यही परिकल्पना सरकार चलाने में भी लागू होती है। यदि मुख्यमंत्री को "फ्रीहैंड" नहीं दिया गया तो राज्य का विकास असंभव है। 

आलाकमान संस्कृति से कांग्रेस का पतन हम देख चुके हैं अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा कांग्रेस की बराबरी कर पाती है नहीं।वैसे भी किसी राज्य के नेता "दिल्ली" में बैठे नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाना पसंद कर सकते हैं लेकिन हस्तक्षेप कभी पसंद नहीं करेंगे।

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