मनुस्मृति में वंचित वर्ग की महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का प्रावधान , My Opinion by Manoj Shrivastava

Updesh Awasthee
मनु ने युद्ध को अंतिम विकल्प (जब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कोई मार्ग शेष ना रह जाए) के रूप में प्रावधानित किया। सिर्फ इतना ही नहीं युद्ध के समय भी मानक और आदर्श का विधान स्थापित किया। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का प्रावधान किया, तो केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य नहीं बल्कि उसे वर्ग की महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का भी प्रावधान किया जो मनुस्मृति जलाने में अपनी शान समझता है। यहां तक की मनु ने शत्रु की महिलाओं और बच्चों की भी सुरक्षा का प्रावधान किया। जबकि ऐसा प्रावधान कहीं और नहीं दिखता। मनुस्मृति को समझना है तो पूर्व IAS मनोज श्रीवास्तव का यह लेख काफी उपयोगी हो सकता है:- 

मनुस्मृति (५४)

मनुस्मृति में युद्ध के प्रावधान इस प्रकार हैं: 
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ।
न निवर्तेत सङ्ग्रामात् क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥
सङ्ग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम् ।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥ 
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः॥
न कूटैरायुधैर्हन्याद् युध्यमानो रणे रिपून् ।
न कर्णिभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ॥ 
न च हन्यात् स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम् ॥ 
न सुप्तं न विसंनाहं न नग्नं न निरायुधम् ।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ॥ 
नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥
यस्तु भीतः परावृत्तः सङ्ग्रामे हन्यते परैः ।
भर्तुर्यद् दुष्कृतं किं चित् तत् सर्वं प्रतिपद्यते ॥

अपने समान, उत्तम, या अधम राजा यदि रण- निमन्त्रण दे तो क्षत्रियधर्म के अनुसार राजा को पीछे नहीं हटना चाहिए। संग्राम से न भागना, प्रजापालन, ब्राह्मणों की सेवा यह सब राजाओं का परम कल्याण करनेवाला है। जो राजा संग्राम में एक एक को मारने का संकल्प कर, आपस में युद्ध करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। 

मनुस्मृति युद्ध में भी मर्यादा का विधान करती है

रण में, कूट-छिपे अस्त्र से, कर्णी ( बाण जो चुभ जाने पर बाहर नहीं निकलता) जहर के बुझे और आग के ज़ले अस्त्रों से शत्रु को नहीं मारना चाहिए। 
जमीन में खड़े हुए शत्रु को, नपुंसक को, हाथ जोड़ने वाले को नहीं मारना चाहिए। 
खुले बालों वाले को, बैंठे को और जो कहे- ‘मैं तुम्हारा हूँ’ उसको भी नहीं मारना चाहिए। 
सोते हुए को, टूटे कवचवाले को, नंगे को, शस्त्रहीन को, युद्ध न करनेवाले को, संग्राम देखते हुए को और दूसरे शत्रु से लड़ते हुए को नहीं मारना चाहिए। 
टूटे शस्त्रवाले को, पुत्रादि शोक से दुःखी को, बहुत घाववाले को, डरपोक को तथा डरकर भागनेवाले को भी नहीं मारना चाहिए। 
जो योद्धा, युद्ध से डरकर पीछे भगता है और शत्रु उसको मार डालते हैं, वह अपने राजा के समस्त पापों को ग्रहण करता है। 

मनु की युद्ध मर्यादाओं के अनुसार ही महाभारत के युद्ध में भीष्म ने दोनों युद्धरत पक्षों के बीच कुछ नियमावली तय की थीं। यह बात अवश्य है कि क्रोधावेश में दुर्योधन और अश्वत्थामा ने उनका उल्लंघन भी किया। 

वह पूरे शहर और आबादी को मारने का आदेश देते हैं

दूसरी ओर बाइबिल का गॉड पूरे के पूरे नगर, पूरी की पूरी आबादियों को मार डालने का आदेश देता है। 
1 सैम्युअल 15:3 में, राजा शाऊल को ईश्वरीय आज्ञा यह है : “अब जाओ, अमालेकियों पर प्रहार करो और उनकी सारी संपत्ति को पूरी तरह नष्ट कर दो। उन पर दया न करो; पुरुषों और स्त्रियों, बच्चों और शिशुओं, गायों और भेड़ों, ऊंटों और गधों को मार डालो।” (सोचिए कि गधों तक से इस हद तक नफ़रत

नंबर्स 31:17 में, मूसा मिद्यान के विरुद्ध युद्ध से लौट रही इस्राएली सेना को निर्देश देते हैं: “अब सभी लड़कों को मार डालो। और हर उस स्त्री को मार डालो जो पुरुष के साथ सो चुकी हो, लेकिन उन लड़कियों को अपने लिए बचा लो जो कभी पुरुष के साथ न सोई हों।”(सोचिये कि लड़कियों के कौमार्य की कितनी चिन्ता है

Deuteronomy 7:1–2 इस्राएलियों को कनान में प्रवेश करने पर “उनका पूर्णतः संहार” करने का आदेश देता है, और इसी में 20:16–17 स्पष्ट रूप से कहता है कि उन राष्ट्रों के शहरों में, जिन्हें परमेश्वर ने उन्हें दिया है, वे किसी भी ऐसी चीज को जिंदा नहीं छोड़ सकते जो साँस लेती हो। जोशुआ इन आदेशों के क्रियान्वयन के बारे में बताते हुए कहता है कि जेरिको, अई और दर्जनों कैन्नाइट शहर नष्ट कर दिये गये हैं।

मनुस्मृति का मानवीय व्यवस्थाकार उपर्युक्त गॉड और पैग़म्बरों से बेहतर है? 
क्रिस्टोफर हिचेंस को तो गॉड इज़ नॉट ग्रेट पुस्तक लिखनी पड़ी गॉड के ऐसे भयावह आदेशों के कारण। वाल्टेयर ने इसे primitive tribalism माना था। अपनी पुस्तक ‘द एज ऑफ रीजन’ में थामस पेन ने इस आधार पर उस पुस्तक को पवित्र मानने से ही इनकार कर दिया। डेविड ह्यूम ने डिवाइन कमांड्स के इस पूरे फ्रेमवर्क पर ही सवाल उठा दिए थे। बर्ट्रेंड रसल ने पूरी पुस्तक लिखी- Why I am not a Christian? रिचर्ड डॉकिन्स ने ऐसे प्रतिशोधी रक्तपिपासु गॉड एद् निक क्लींजिंग करने वाले गॉड की खूब मजम्मत की।

बात इससे नहीं सुलझती कि इतने समझदारों ने ऐसे गॉड की आलोचना की। सो तो  पॉल  कोपान ने अपनी Is God a Moral Monster? में ऐसे उद् गारों का औचित्यीकरण भी किया। जॉन गोल्डिंगे और क्रिस्टोफर राइट ने भी। पर वह बात है ही नहीं। बात तो यह है कि क्या ऐसे गॉडाज्ञाओं का व्यवहार में पालन भी हुआ। 

और वह हुआ। उत्तर और दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया सब जगह एद् निक क्लीन्जिंग का भयावह दौर चला। हिरोशिमा और नागासाकी और गाजा पर बम गिराते हुए बच्चों का ख़याल नहीं आया। पूर्व में उद्धृत 1 सैम्युअल 15:3 में बच्चों के साथ साथ “और शिशुओं “ तक का शब्द प्रयोग विचित्र क्रूरता है - children and infants. 

उसकी तुलना में क़ुरआन ने वाकई इस जहालत के विरुद्ध जाकर बक़रह (2:190)” में कहा कि 
“और अल्लाह की राह में उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, लेकिन ज़्यादती मत करो। बेशक अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।" 
सूरह हज (22:39) में कहा “उन लोगों को लड़ने की अनुमति दी गई है जिन पर ज़ुल्म किया गया, क्योंकि उन पर अत्याचार हुआ है।"

शांति प्रस्ताव पर युद्ध बंद करना अनिवार्य 
सूरह अनफ़ाल (8:61) में बताया गया ; और अगर वे शांति की ओर झुकें, तो तुम भी झुको और अल्लाह पर भरोसा रखो।"
सूरह बक़रह (2:192) “फिर अगर वे रुक जाएँ, तो अल्लाह बहुत क्षमाशील और दयालु है।" 

नागरिकों की सुरक्षा - सूरह बक़रह (2:191) में यों बताई गई -“फ़ितना (अत्याचार/उपद्रव) हत्या से भी बड़ा पाप है।" निम्नलिखित पर हमला करना वर्जित है: महिलाएँ और बच्चे बूढ़े और बीमार धार्मिक स्थलों में बैठे लोग।

खेती और पेड़-पौधे नष्ट करना - सूरह मुहम्मद (47:4)…फिर (युद्ध के बाद) एहसान करके छोड़ दो या फिरौती लेकर।" 
सीमा उल्लंघन की मनाही - सूरह बक़रह (2:190) के दूसरे भाग में ..”लेकिन हद से आगे मत बढ़ो।" कहकर की गई। सूरह माइदह (5:87) में कहा गया “अल्लाह हद से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता।"

इसलिए क़ुरआन के बारे में कई मौकों पर वह क्लेम सही है कि उसके पहले (उस क्षेत्र में जो उस ग्रंथ का तात्कालिक भूगोल था) जहालत थी- लेकिन जैसा कि हम बार-बार देखते आये हैं कि व्यवहार में स्थिति उन्हीं के जैसी रही जिनका इन सूरह सिद्धांतों ने विकल्प दिया था। मसलन 9:5 में कहा गया कि सूरह अत-तौबा (9:5), जिसे अक्सर "तलवार की आयत" कहा जाता है, पवित्र महीने (हरम महीने) समाप्त होने के बाद बहुदेववादियों (मुश्रिकों) के खिलाफ युद्ध का आदेश देती है। यह आयत कहती है कि उन्हें जहाँ भी पाओ, मार डालो, पकड़ो और घेरो, जब तक कि वे तौबा (पश्चाताप) करके नमाज़ और ज़कात (दान) कायम न करें।” 

खंदक की जंग (627 ई.) के बाद, यहूदी कबीला बनू कुरैज़ा पर आरोप लगा कि उन्होंने मदीना पर हमले के दौरान संधि तोड़ी और दुश्मन का साथ दिया। आत्मसमर्पण के बाद, कबीले ने खुद साद इब्न मुआज़ को निर्णायक चुना। उन्होंने फैसला दिया कि योद्धा पुरुषों को मार दिया जाए, महिलाओं-बच्चों को कैदी बनाया जाए (उस समय के युद्ध के नियमों के अनुसार)। पैगंबर मुहम्मद ने इसे अल्लाह के फैसले के समान बताया। साद ने कहा, “मैं फैसला करता हूँ कि उनके योद्धाओं को मार दिया जाए और उनके बच्चे-औरतों को कैदी बनाया जाए।” पैगंबर ने फरमाया, “तुमने अल्लाह के फैसले जैसा फैसला किया है।(सहीह बुखारी 5:58:148, सहीह मुस्लिम 19:4364) अनुमानित 400-900 वयस्क पुरुषों को मौत दी गई (बालिग होने की उम्र के आधार पर), और उनकी संपत्ति बाँटी गई। सहीह बुखारी 1:2:25 की एक हदीस में यह कहा गया कि मुझे आदेश दिया गया है कि लोगों से लड़ूँ जब तक वे न कहें ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’…”। सूरह अल अनफाल (8:41) ने ग़नीमा की बात की जो विजित स्त्रियों को विजेताओं द्वारा बाँट लेने तक पहुँच गया और मध्ययुगीन आक्रमणों का हिस्सा बन गया। 

जेनेवा कन्वेंशन से लेकर अन्य बहुत से अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मनु के अनुसार चले हैं

मनु की युद्ध मर्यादाएँ आधुनिक युग के लिए अधिक उपयुक्त हैं, क्योंकि वे मानवीयता, अनुपातिकता और गैर-योद्धाओं की रक्षा पर जोर देती हैं, जो वर्तमान वैश्विक कानूनों से मेल खाती हैं। ये नैतिक प्रतिबंध लगाती हैं जो आधुनिक कानूनों से मेल खाती हैं: गैर-योद्धाओं की रक्षा, आत्मसमर्पण पर दया, युद्ध से पहले शांति प्रयास। यह “न्यायपूर्ण युद्ध” (just war theory) के समान है, जहाँ क्रूरता सीमित है। आधुनिक सेनाएँ (जैसे भारतीय सेना के नैतिक कोड) में ऐसे नियम अपनाए जाते हैं। 

मनु ने कहा कि महिलाओं, बच्चों, किसानों, तपस्वियों, यात्रियों, भोजन करते हुए, सोते हुए, या सामान्य कार्य में लगे लोगों पर हमला निषिद्ध है तो जेनेवा कन्वेंशन्स (1949) और संबंधित प्रोटोकॉल में नागरिकों (civilians), घायलों, बीमारों, जहाज़ डूबने वालों, और युद्ध में भाग न लेने वालों की रक्षा कही गई है। चौथे जेनेवा कन्वेंशन में  नागरिकों को हिंसा, यातना, अपमान से बचाने की बात कही गई। कॉमन अनुच्छेद 3 सभी गैर-योद्धाओं से मानवीय व्यवहार की बात कहता है। 

मनु यदि कहते हैं कि हथियार फेंक चुके, भागते हुए, डरे हुए, घायल, सोते हुए, या “मैं तेरा हूँ” कहने वाले पर हमला न करें और पीठ दिखाने वाले या भागने वाले को न मारें तो जेनेवा समझौता Hors de combat (युद्ध से बाहर), घायल, बीमार, आत्मसमर्पण करने वाले, कैदियों को मारना निषिद्ध बताता है। तीसरा जेनेवा कन्वेंशन युद्धबंदियों  को यातना, अपमान से बचाना आवश्यक कहता है। 

मनु यदि कहते हैं कि छिपे हुए हथियार, जहर वाले तीर, काँटेदार तीर, आग लगाने वाले तीर का उपयोग न करें, तो हेग कन्वेंशन्स + जेनेवा दोनों जहर, विषाक्त हथियार, अनावश्यक पीड़ा देने वाले हथियार निषिद्ध बताते हैं। 

Additional Protocol I (1977) में अनुपातिकता और भेदभाव का सिद्धांत; अनावश्यक दुख न दें। मनु यदि महिलाओं और बच्चों पर हमला निषिद्ध (गैर-योद्धा के रूप में बताते हैं तो चौथा जेनेवा समझौता महिलाओं को सम्मान, बलात्कार, जबरन वेश्यावृत्ति से विशेष रक्षा की बात कहता है। बच्चे (15 वर्ष से कम) को विशेष संरक्षण, अलगाव न होने देने, उनके शिक्षा/स्वास्थ्य की बात पहले Additional Protocol में कही गई है। 

मनु यदि युद्ध को अंतिम विकल्प कहते हुए कहते हैं कि साम, दाम भेद पहले आजमाएँ और समान योद्धा से लड़ें (रथी-रथी, आदि)। वे दिन में ही लड़ाई का प्रावधान करते हैं और अचानक  हमले को निषिद्ध करते हैं। तो आधुनिक युद्ध की Martens Clause योद्धा vs गैर-योद्धा को अलग करती है।

तो एक तरह से देखा जाए तो मनु आधुनिक वारफ़ेयर का अंतरराष्ट्रीय मानक और आदर्श हैं पर आधुनिक युद्ध-यथार्थ एक बड़ी हद तक बिब्लिकल है। स्वयं पाकिस्तान ने बांग्लादेश पर जो कुछ 1971 में किया वह क़ुरआन के इस्लामिक आदर्शों के अनुकूल न था। जो उन्होंने इज़रायली स्त्रियों और बच्चों के साथ किया वह भी न था। आतंकवाद की पूरी रणनीति जो सरप्राइज़ पर ही आधारित है, और नॉन कम्बेटेंट्स को ही मारती है, वह भी मनु के सिद्धांतों के ठीक विपरीत है। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर से पूर्व पाकिस्तान को जो चेताया, वह मनु की आकस्मिकता-वर्जना का ही परिणाम थी। 

हाँ और ध्यान दीजिए कि मनु ने कोई वर्ण भेद नहीं किया कि शूद्र्र महिलाओं और बच्चों पर रहम न किया जाए। प्रक्षेपकार यहाँ चूक कर गये हैं। 
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