जबलपुर, 17 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े बहुप्रतीक्षित 'मध्य प्रदेश सिविल सेवा पदोन्नति नियम 2025' की कानूनी वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज माननीय हाई कोर्ट में अंतिम सुनवाई पूरी हो गई। मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव सचदेवा और जस्टिस श्री विनय सराफ की खंडपीठ ने इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।
राज्य सरकार का स्पष्टीकरण: मेरिट बनाम आरक्षण
अधिवक्ता श्री रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बताया कि, सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. बैद्यनाथण ने पक्ष रखा। सरकार ने कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण पेश करते हुए कहा कि आरक्षित वर्ग के वे कर्मचारी और अधिकारी, जो पूर्व में मेरिट (योग्यता) के आधार पर अनारक्षित श्रेणी में पदोन्नति प्राप्त कर चुके हैं, उनकी गिनती अब आरक्षित वर्ग के भीतर ही की जाएगी। सरकार ने स्पष्ट किया कि राज्य में आनुपातिक आरक्षण (Proportional Reservation) के सिद्धांतों का पालन करते हुए अनुसूचित जाति (SC) के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण का लाभ प्रदान किया जाएगा।
अजाक्स संघ की याचिका खारिज
कोर्ट ने अजाक्स (AJAKS) संघ द्वारा 03 अप्रैल 2025 को दायर की गई एक पृथक याचिका को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया है। इस याचिका में पदोन्नति नियम के नियम 5 और नियम 11 की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि ये प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के साथ असंगत हैं। हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए तर्क दिया कि यह याचिका नियमों के अस्तित्व में आने (बनने) से पूर्व ही दायर कर दी गई थी, जिस कारण इसकी वैधानिकता पर वर्तमान स्वरूप में विचार नहीं किया जा सकता।
मामले की अंतिम सुनवाई शाम 4:30 बजे से 5:30 बजे तक चली। अजाक्स संघ और अन्य हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं पुष्पेंद्र कुमार साह ने अपनी दलीलें पेश कीं।
राज्य सरकार के नए पदोन्नति नियमों पर हाई कोर्ट का आने वाला फैसला प्रदेश के लाखों कर्मचारियों के भविष्य और पदोन्नति प्रक्रिया की दिशा तय करेगा। फिलहाल, सभी की निगाहें कोर्ट के सुरक्षित रखे गए आदेश पर टिकी हैं।

.webp)