Madhya Pradesh मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना 2023 पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का अहम फैसला

Updesh Awasthee
इन्दौर, 12 फरवरी 2026
: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इन्दौर पीठ ने राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना, 2023' के कार्यान्वयन को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। यह जनहित याचिका विधायक श्री पारस सकलेचा द्वारा लगाई गई थी।

मामले की पूरी कहानी, विवाद का कारण

मध्य प्रदेश सरकार ने 1 मार्च 2023 को महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन, स्वास्थ्य और पोषण में सुधार के उद्देश्य से 'मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना' की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत पात्र महिलाओं को शुरुआत में 1,000 रुपये प्रति माह दिए जाने का प्रावधान था, जिसे बाद में बढ़ाकर 1,250 रुपये कर दिया गया। शुरुआत में पात्रता के लिए आयु सीमा 23 से 60 वर्ष तय की गई थी, जिसे बाद में घटाकर 21 से 60 वर्ष कर दिया गया। विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने 20 अगस्त 2023 से नए पंजीकरण बंद कर दिए। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता पारस सकलेचा ने उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (Writ Petition No. 49798 of 2025) दायर की।

पक्ष-विपक्ष के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील श्री विभोर खंडेलवाल ने दलील दी कि पंजीकरण बंद करना अवैध और मनमाना है क्योंकि यह योजना निरंतर स्वरूप की है। उन्होंने तर्क दिया कि 21 से 60 वर्ष की आयु सीमा तय करना भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय को सरकार के नीतिगत निर्णयों की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार है। 

• राज्य सरकार की ओर से श्री सुदीप भार्गव (उप महाधिवक्ता) और श्री प्रद्युम्न किबे (सरकारी वकील) ने पैरवी की। उन्होंने तर्क दिया कि यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय (Policy Decision) है और कोई भी वास्तविक उम्मीदवार जिसे लाभ नहीं मिला, वह न्यायालय नहीं आया है। इसलिए, एक जनहित याचिका के माध्यम से इस नीति की जांच नहीं की जा सकती।

हाई कोर्ट का फैसला

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने की। न्यायालय ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
1. न्यायालय ने कहा कि यह एक कार्यकारी नीति (Executive Policy) है और राज्य के पास यह तय करने का अधिकार है कि योजना कब शुरू की जाए और कब बंद की जाए।
2. 21 से 60 वर्ष की न्यूनतम और अधिकतम आयु सीमा तय करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और इसमें कुछ भी मनमाना नहीं पाया गया।
3. न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि अदालतें विशेषज्ञों के नीतिगत निर्णयों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करतीं जब तक कि वे असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण न हों।
4. अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता स्वयं इस योजना का लाभ पाने वाला व्यक्ति (aspirant) नहीं है, इसलिए जनहित याचिका के माध्यम से वह राशि बढ़ाने जैसे मुद्दों को नहीं उठा सकता।
न्यायालय ने याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

खबर का सबक

इस मामले की सबसे प्रमुख बात यह रही कि न्यायालय ने 'न्यायिक समीक्षा की सीमा' को रेखांकित किया। कोर्ट ने साफ कर दिया कि जनकल्याणकारी योजनाओं की रूपरेखा, उनके लाभार्थियों का चयन और समय-सीमा तय करना कार्यपालिका (Executive) का काम है, और जब तक वे कानून के दायरे में हैं, न्यायपालिका उनमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!