ग्वालियर, 12 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने कर्मचारी हितों की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला उन हजारों सरकारी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल है जो झूठे आरोपों के कारण सालों तक निलंबन और आर्थिक तंगी झेलते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को विभाग की पहल पर दर्ज मामले के कारण निलंबित किया जाता है और बाद में वह पूरी तरह निर्दोष पाया जाता है, तो उसे 'नो वर्क नो पे' के आधार पर वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की पूरी कहानी: 27 साल लंबी कानूनी जंग
यह मामला गोविंद प्रसाद शर्मा का है, जो विदिशा जिले के गंजबासौदा स्थित शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में असिस्टेंट ग्रेड-III के पद पर कार्यरत थे। 28 जून 1997 को स्कूल के प्राचार्य की शिकायत पर छात्रवृत्ति राशि के गबन के आरोप में उनके खिलाफ आपराधिक मामला (क्रिमिनल केस नंबर 291/96) दर्ज हुआ और उन्हें निलंबित कर दिया गया। लगभग 11 साल तक निलंबित रहने के बाद, उनके आवेदन पर विभाग ने 18 जनवरी 2008 को उनका निलंबन रद्द कर दिया। 11 मार्च 2011 को न्यायालय ने उन्हें आपराधिक मामले में बरी कर दिया। इसके बाद विभाग ने उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच को भी 25 फरवरी 2014 को बिना किसी दंड के समाप्त कर दिया।
विभाग ने उन्हें बहाल तो कर दिया, लेकिन निलंबन अवधि (1997 से 2008) का वेतन यह कहकर देने से इनकार कर दिया कि उन्होंने इस दौरान काम नहीं किया था ('नो वर्क नो पे')।
पक्ष-विपक्ष के वकीलों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री योगेश चतुर्वेदी ने दलील दी कि गोविंद प्रसाद शर्मा का निलंबन पूरी तरह अनुचित था। उन्होंने तर्क दिया कि फंडामेंटल रूल 54-B(3) और (4) के तहत, यदि निलंबन अनुचित पाया जाता है और कर्मचारी निर्दोष साबित होता है, तो वह पूरे वेतन का हकदार है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि विभाग (प्राचार्य) ने ही केस दर्ज कराया था और वह अंततः गलत साबित हुआ, इसलिए कर्मचारी को आर्थिक नुकसान नहीं होना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील श्री योगेश पाराशर ने विभाग के आदेश का बचाव करते हुए तर्क दिया कि निलंबन के दौरान याचिकाकर्ता ने कोई काम नहीं किया था, इसलिए 'नो वर्क नो पे' के सिद्धांत के तहत वह वेतन का हकदार नहीं है।
न्यायालय का फैसला
इस मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने की। उन्होंने दोनों पक्षों की सुनवाई करने के बाद फैसला दिया कि:-
1. चूंकि कर्मचारी पर विभाग ने खुद केस दर्ज कराया था और वह पूरी तरह दोषमुक्त (Exonerated) हो गया है, इसलिए उसका निलंबन 'Wholly Unjustified' (पूरी तरह से अनुचित) था।
2. कोर्ट ने 25 फरवरी 2014 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत वेतन रोका गया था।
3. अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि वह 28.06.1997 से 13.02.2008 तक की निलंबन अवधि को 'ड्यूटी' माने और सभी बकाया वेतन (Difference of salary), भत्ते और एरियर का भुगतान तीन महीने के भीतर करे। यदि तीन महीने में भुगतान नहीं होता है, तो कर्मचारी को 6% वार्षिक दर से ब्याज भी देना होगा।
खबर का सबक
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने 'स्वयं की गलती' और 'परिस्थितिजन्य मामले' में अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी अपनी निजी हरकतों से किसी बाहरी आपराधिक मामले में फंसता है, तो विभाग वेतन रोक सकता है। लेकिन, यदि विभाग की अपनी शिकायत पर कर्मचारी निलंबित होता है और बाद में वह बेगुनाह निकलता है, तो विभाग अपनी गलती का खामियाजा कर्मचारी पर नहीं डाल सकता।

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