नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026: देश की सुरक्षा में अपना जीवन समर्पित करने वाले पूर्व सैनिकों के लिए भारत के उच्चतम न्यायालय से एक ऐतिहासिक और राहत भरी खबर आई है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि विकलांगता पेंशन (Disability Pension) का लाभ और उसका बकाया (Arrears) केवल तीन वर्षों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि यह उस तिथि से देय होगा जब से यह सैनिक का अधिकार बना था।
Broad Banding पॉलिसी के कारण विवाद शुरू हुआ
इस मामले की जड़ें भारतीय वायु सेना के सार्जेंट गिरीश कुमार और उनके जैसे कई अन्य पूर्व सैनिकों की अपीलों में छिपी हैं। सार्जेंट गिरीश कुमार 1988 में वायु सेना में भर्ती हुए थे और 2008 में सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए। सेवा के दौरान उन्हें 20% विकलांगता हुई, जिसे सैन्य सेवा के कारण माना गया। विवाद तब शुरू हुआ जब 'ब्रॉड बैंडिंग' (Broad Banding) की नीति आई। इस नीति के तहत, यदि किसी सैनिक की विकलांगता 50% से कम है, तो उसे पेंशन के उद्देश्य से 50% माना जाता है। सरकार ने पहले इसे केवल उन सैनिकों के लिए लागू किया था जो सेवा के दौरान चोट के कारण बाहर (Invalidated out) हुए थे, न कि उनके लिए जो अपनी अवधि पूरी कर सेवानिवृत्त (Superannuated) हुए थे।
तीन साल की सीमा पर आपत्ति
2014 में 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम अवतार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि यह लाभ सभी विकलांग सैनिकों को मिलेगा। इसके बाद जब सैनिक आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) पहुंचे, तो ट्रिब्यूनल ने कुछ मामलों में तो पूरा बकाया दे दिया, लेकिन कई मामलों में बकाये को आवेदन करने से केवल 3 साल पहले तक ही सीमित कर दिया। इसी "तीन साल की सीमा" को लेकर यह पूरी कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
न्यायालय और न्यायाधीश यह फैसला भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) की सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार पीठ द्वारा सुनाया गया। इस मामले की सुनवाई और फैसला करने वाले माननीय न्यायाधीश हैं:
1. जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा
2. जस्टिस आलोक अराधे (जिन्होंने फैसला लिखा)
वकीलों के तर्क
भारत सरकार (अपीलकर्ता) की ओर से भारत के महान्यायवादी (Attorney General) पेश हुए। सरकार का तर्क था कि पेंशन के बकाये का दावा 'लिमिटेशन एक्ट' (Limitation Act) और 'आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल एक्ट' की धारा 22 के तहत आता है। उनके अनुसार, भले ही यह लगातार होने वाली गलती (Continuing wrong) हो, लेकिन बकाया राशि को केवल तीन साल तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।
पूर्व सैनिकों (प्रतिवादी) की ओर से विभिन्न विद्वान अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा। वकीलों ने दलील दी कि 'राम अवतार' मामले का फैसला एक 'जजमेंट इन रेम' (Judgment in rem) यानी सबके लिए लागू होने वाला फैसला था। पेंशन का अधिकार एक 'वेस्टेड राइट' (Vested right) है और इसे रोकना संपत्ति के अधिकार से वंचित करने जैसा है। उन्होंने तर्क दिया कि सैनिकों को अपने हक के लिए बार-बार अदालत आने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
12 फरवरी, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार की सभी अपीलों को खारिज कर दिया और पूर्व सैनिकों की अपीलों को स्वीकार कर लिया। न्यायालय के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को रद्द कर दिया जिन्होंने बकाये को 3 साल तक सीमित किया था।
2. कोर्ट ने आदेश दिया कि पात्र सैनिक 01.01.1996 या 01.01.2006 (जैसा भी मामला हो) से 'ब्रॉड बैंडिंग' के साथ विकलांगता पेंशन के बकाये के हकदार हैं।
3. इस बकाया राशि पर सरकार को 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा।
4. कोर्ट ने कहा कि चूंकि सरकार ने स्वयं 2016 में आदेश जारी कर इसे स्वीकार किया था, इसलिए देरी या समय सीमा के आधार पर सैनिकों को उनके हक से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की प्रमुख बात: पेंशन 'खैरात' नहीं है
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यह रही कि पेंशन कोई इनाम, बख्शिश या राज्य की मर्जी पर निर्भर 'खैरात' (Bounty) नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह सैनिक द्वारा दी गई पिछली सेवाओं का एक 'स्थगित मुआवजा' (Deferred portion of compensation) है। विकलांगता पेंशन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत 'संपत्ति का अधिकार' है, जिसे कानूनी प्रक्रिया के बिना छीना या कम नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने सरकार को एक 'मॉडल एम्प्लॉयर' (Model Employer) की तरह व्यवहार करने की सलाह दी, जो अपने उन सैनिकों के प्रति निष्पक्ष रहे जिन्होंने राष्ट्र की सेवा में बलिदान दिया है।

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