नई दिल्ली, 6 फरवरी 2026: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लाखों सरकारी कर्मचारियों के पक्ष में एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि महंगाई भत्ता (DA) प्राप्त करना कर्मचारियों का कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार है, न कि सरकार की कोई दया या दान। देश के धुरंधर वकील कपिल सिब्बल भी इस मामले में सरकार का बचाव नहीं कर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने केवल फैसला नहीं दिया बल्कि निगरानी समिति का गठन भी किया ताकि सरकार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में कोई गड़बड़ी न कर पाए।
मामले की पृष्ठभूमि और पूरी कहानी
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल सरकार ने पाँचवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर RoPA नियम, 2009 (Revision of Pay and Allowance Rules) लागू किए। इन नियमों में DA को 'मौजूदा उपलब्धियों' (Existing Emoluments) के हिस्से के रूप में स्वीकार किया गया था, जो अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI) पर आधारित था। कर्मचारियों का आरोप था कि राज्य सरकार ने 2008 से 2019 के बीच केंद्र सरकार के समान दरों पर DA का भुगतान नहीं किया, जिससे उनके वेतन का वास्तविक मूल्य मुद्रास्फीति के कारण कम हो गया। जब यह मामला ट्रिब्यूनल (SAT) पहुँचा, तो पहले इसे खारिज कर दिया गया, लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने 'राउंड वन' की मुकदमेबाजी में इसे कर्मचारियों का कानूनी अधिकार घोषित किया।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने की। न्यायालय ने हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को DA देने से इनकार नहीं कर सकती।
दिग्गज वकीलों के बीच कानूनी बहस
अदालत में दोनों पक्षों की ओर से देश के नामचीन वकीलों ने अपनी दलीलें पेश कीं:
राज्य सरकार (अपीलकर्ता) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान और हुज़ेफ़ा अहमदी ने दलील दी कि DA देना राज्य के संसाधनों और वित्तीय क्षमता पर निर्भर करता है। उन्होंने 'फंड्स की कमी' (Paucity of Funds) का हवाला देते हुए इसे राज्य की राजकोषीय स्वायत्तता का हिस्सा बताया।
कर्मचारियों (प्रतिवादी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, पी.एस. पटवालिया, बिकास रंजन भट्टाचार्य और करुणा नंदी ने तर्क दिया कि एक बार जब सरकार ने RoPA नियमों के तहत AICPI पैटर्न को अपना लिया है, तो वह मनमाने ढंग से इससे पीछे नहीं हट सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
1. कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि धन की कमी के कारण DA नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक कर्तव्यों और कानूनी दायित्वों से बचने के लिए वित्तीय कठिनाई का सहारा नहीं लिया जा सकता।
2. कोर्ट ने माना कि RoPA नियमों के तहत DA एक कानूनी अधिकार बन चुका है। यह कर्मचारियों को बढ़ती कीमतों से बचाने का एक साधन है ताकि वे मानवीय गरिमा के साथ जीवन जी सकें।
3. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'मौजूदा उपलब्धियों' की गणना के लिए AICPI (1982=100) ही मानक रहेगा और सरकार अपनी मर्जी से इसमें बदलाव नहीं कर सकती।
4. कर्मचारियों को 2008 से 2019 के बीच की अवधि का DA बकाया (Arrears) पाने का हकदार माना गया है।
निगरानी समिति का गठन
मामले की गंभीरता और वित्तीय जटिलता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जिसमें शामिल हैं:
• अध्यक्ष: सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, माननीय न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा।
• सदस्य: न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान, न्यायमूर्ति गौतम भादुड़ी और भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा नामित एक वरिष्ठ अधिकारी।
यह समिति भुगतान की कुल राशि और भुगतान के कार्यक्रम (Schedule) का निर्धारण करेगी, जिसे राज्य सरकार को मानना अनिवार्य होगा। न्यायालय ने निर्देश दिया कि पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च, 2026 तक हो जाना चाहिए।
निष्कर्ष: यह फैसला न केवल पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों के लिए एक बड़ी जीत है, बल्कि यह देश भर के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल पेश करता है कि सरकारें 'वित्तीय संकट' का हवाला देकर कर्मचारियों के कानूनी हक को नहीं छीन सकतीं।

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