नई दिल्ली, 5 फरवरी 2026: भारत के सभी केंद्रीय कर्मचारियों और सभी राज्य कर्मचारियों के लिए यह बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण खबर है। एक छोटी सी गलती उनको बर्खास्त किए जाने का कारण बन सकती है। झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट, कल तक एक सामान्य बात थी लेकिन हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट, आपकी नौकरी के लिए खतरा होगा।
छुट्टी पर गए कर्मचारी ने उस डॉक्टर से मेडिकल बनवाया जो खुद छुट्टी पर था
दिल्ली हाई कोर्ट में यह मामला कब शुरू हुआ जब CAG OFFICE की ओर से एक रिट पिटीशन फाइल की गई। इसमें सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के आर्डर को चैलेंज किया गया था। CAG OFFICE का एक क्लर्क लंबे समय तक छुट्टी पर रहा। इसके लिए उसने पूर्व में कोई अनुमति नहीं ली थी। बाद में उसने बिना अनुमति दी गई छुट्टी को जस्टिफाई करने के लिए एक ऐसे डॉक्टर द्वारा बनाए गए मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया, जो खुद छुट्टी पर थी। बात बड़ी सिंपल थी कि जो डॉक्टर को छुट्टी पर है, वह अस्पताल में किसी का इलाज कैसे कर सकता है। जो मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया गया वह झूठा है। इसमें डॉक्टर भी शामिल है लेकिन CAG OFFICE की जांच में अपने कर्मचारियों के सच और झूठ का पता लगाने का आदेश था इसलिए, CAG OFFICE क्लर्क का झूठा प्रमाणित हुआ और ऐसे कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी गई।
माना कि कर्मचारी ने गलती की है लेकिन बर्खास्त नहीं कर सकते: CAT
विभाग की जांच के बाद हुई सेवा समाप्ति के खिलाफ कर्मचारियों ने CAT में अपील की। CAT ने दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद, कर्मचारियों को बर्खास्त किए जाने की सजा वाले आदेश को निरस्त कर दिया। CAT क्या कहना था कि बिना अनुमति के लिए गई छुट्टी को उचित बताने के लिए झूठा मेडिकल प्रस्तुत करना एक सामान्य बात है। कर्मचारियों को दंडित किया जा सकता है लेकिन उसको बर्खास्त कर दिया जाना एक कठोर सजा होगी। छोटी सी गलती के लिए इतनी कठोर सजा नहीं दे सकते।
झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट मामले में हाई कोर्ट का लैंडमार्क डिसीजन
CAG OFFICE ने CAT के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिट पिटीशन फाइल की। जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने सभी पक्षों की सुनवाई करने के बाद एक ऐसा लैंडमार्क जजमेंट दिया, जिसका उल्लेख पूरे भारत देश में किया जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा, "एक सरकारी कर्मचारी द्वारा झूठे या जाली मेडिकल सर्टिफिकेट पेश करना गंभीर दुराचार है, जो बेईमानी, और ईमानदारी की कमी को दर्शाता है और नौकरी से निकालने का कारण बनता है।"
किरण ठाकुर बनाम रेजिडेंट कमिश्नर (2023)
मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जो कर्मचारी अपने मालिक को जाली दस्तावेज़ जमा करने के दोषी है, उनके साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के खिलाफ आरोप सिर्फ बिना इजाज़त छुट्टी का नहीं था, बल्कि मालिक को गुमराह करने और अनुचित लाभ पाने के लिए झूठे मेडिकल दस्तावेज़ पेश करने की बेईमानी का काम था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा आचरण एक सरकारी कर्मचारी से अपेक्षित ईमानदारी और भरोसे की जड़ पर चोट करता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा
"बिना इजाज़त छुट्टी को सही ठहराने के लिए झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट देने के काम को सामान्य बात नहीं माना जा सकता। यह कर्मचारी के अंदर ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की कमी को प्रमाणित करता है और गंभीर दुराचार है।"
हम CAT का अपीलीय प्राधिकरण नहीं है लेकिन...
हाई कोर्ट ने कहा कि कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करने वाला कोर्ट अनुशासनात्मक प्राधिकरण के निष्कर्षों पर अपीलीय प्राधिकरण के रूप में नहीं बैठता है और आमतौर पर सबूतों का फिर से मूल्यांकन नहीं करता है। "दखल तब ज़रूरी होता है, जब निष्कर्ष गलत हों, किसी सबूत पर आधारित न हों, या जहां जांच वैधानिक प्रावधानों या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन से दूषित हो।"
इस तरह दिल्ली हाई कोर्ट ने CAT का आदेश रद्द किया और कर्मचारी को नौकरी से निकालने का फैसला बरकरार रखा।

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