भोपाल समाचार, 30 जनवरी 2026: मुख्य सचिव तक शिकायत करने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो एक कंपनी के अधिकारियों ने मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा किए जा रहे इंटरेक्टिव पैनल खरीदी घोटाले का खुलासा कर दिया। यह घोटाला भी पूरा नहीं हुआ है बल्कि LIVE चल रहा है। इस मामले में लोक शिक्षण संचालनालय की कमिश्नर श्रीमती शिल्पा गुप्ता और स्कूल शिक्षा मंत्री श्री उदय प्रताप सिंह, दोनों की भूमिका संदिग्ध है।
मामला क्या है सरल शब्दों में समझ लीजिए
- भारत सरकार ने मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों को डिजिटल क्लासरूम में बदलने के लिए 150 करोड रुपए दिए हैं।
- लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा इसके लिए 10149 इंटरएक्टिव पैनल (65 इंच) खरीदे जा रहे हैं।
- इसके लिए 1.14 लाख रुपए प्रति पैनल भुगतान किया जाएगा। और ₹19000 प्रति वर्ष, लगातार 5 साल तक, मेंटेनेंस चार्ज दिया जाएगा।
- बात यह है कि यही इंटरएक्टिव पैनल समग्र शिक्षा अभियान के तहत 1.10 लाख रुपए में खरीदे गए थे। तब स्कूल शिक्षा मंत्री ने इस खरीदी को घोटाला मानते हुए डिपार्मेंटल इंक्वारी के आदेश दिए थे। यह जांच अभी चल रही है। अब यही इंटरएक्टिव पैनल लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा 1.14 लाख रुपए में खरीदे जा रहे हैं। यानी जिसने घोटाला पकड़ा था, और जो घोटाला पड़ा था, वही घोटाला खुद करने लग गया है।
- स्कूल शिक्षा मंत्री श्री उदय प्रताप सिंह की भूमिका इसलिए संदिग्ध है क्योंकि इस बार उन्होंने जांच का आदेश नहीं दिया है।
- लोक शिक्षण संचालनालय की कमिश्नर श्रीमती शिल्पा गुप्ता की भूमिका इसलिए संदिग्ध है क्योंकि यदि मुख्य सचिव से शिकायत हुई है तो यह शिकायत नियम के अनुसार आयुक्त श्रीमती शिल्पा गुप्ता के पास जरूर आई होगी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।
- पिछले दिनों कलेक्टर की कॉन्फ्रेंस में मुख्य सचिव ने कहा था, सभी कलेक्टर पैसे खाते हैं, यह मामला कुछ ऐसा ही है।
70000 का पैनल 1.14 लाख रुपए में खरीद रहे हैं
बिल्कुल यही इंटरएक्टिव पैनल इसी योजना के तहत असम राज्य सरकार ने ₹70000 में खरीदा है। लोक शिक्षण संचालनालय को भी व्यू सोनिक नामक एक नेशनल कंपनी ने ₹70000 में पैनल देने का प्रस्ताव किया था, लेकिन उनके प्रस्ताव में छोटी-मोटी गलती निकाल कर उसको रिजेक्ट कर दिया गया।
इस मामले में, यह शक करने के पर्याप्त कारण उपलब्ध है कि, भ्रष्टाचार करने की नीयत से ₹70000 का पैनल 1.14 लाख रुपए में खरीदा जा रहा है। मध्य प्रदेश के सरकारी विभागों में इस प्रकार के भ्रष्टाचार को कमीशन कहा जाता है। यह लगभग 39% कमीशन (भ्रष्टाचार) का मामला है।

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