मेरे प्रिय, जिसे तुम अपना जीवन कहते हो, वह वास्तव में तुम्हारा है ही नहीं। तुम जिसे 'मैं' कहते हो, वह एक बहुत छोटा सा बिंदु है, जिसके पीछे तुम्हारे पूर्वजों की हजारों मील लंबी कतार खड़ी है। तुम कभी अकेले थे ही नहीं; तुम्हारे भीतर हजारों साल पुराने मुर्दे आज भी सांस ले रहे हैं, और तुम्हारे खून की हर बूंद में एक प्राचीन कहानी और एक अनसुनी चीख छिपी है।
ज्योतिष के पितृदोष को आधुनिक विज्ञान में एपिजेनेटिक्स कहते हैं
जिसे ज्योतिष की पुरानी भाषा 'पितृदोष' कहकर तुम्हें डराती है, आज का आधुनिक विज्ञान उसे 'एपिजेनेटिक्स' (Epigenetics) कहता है। नाम बदल गए हैं, लेकिन हकीकत वही है। तुम्हारे दादा का डर और तुम्हारे परदादा का तनाव आज भी तुम्हारे डीएनए (DNA) में जिंदा है। तुम बिना कारण उदास हो जाते हो, तुम्हें ऐसा गुस्सा आता है जिसका कोई सिरा नहीं मिलता, और सब कुछ ठीक होने पर भी एक अनजाना डर तुम्हें घेर लेता है; यह तुम्हारा स्वभाव नहीं, बल्कि वह 'प्रोग्रामिंग' है जो तुम्हें वसीयत में मिली है। जैसे मकान और दुकानें विरासत में मिलती हैं, वैसे ही पागलपन और डिप्रेशन भी विरासत में मिलते हैं।
विज्ञान के प्रयोग से पितृदोष प्रमाणित हुआ
इस सत्य को समझने के लिए विज्ञान के एक प्रयोग को देखो। जब चूहों को चेरी ब्लॉसम की खुशबू के साथ बिजली का झटका दिया गया, तो उनमें उस खुशबू के प्रति डर बैठ गया। लेकिन आश्चर्य यह था कि उनकी आने वाली सात पीढ़ियों तक, जिन्होंने कभी उस करंट को महसूस नहीं किया था, वे भी उस खुशबू से थर-थर कांपने लगे। इसे विज्ञान 'ट्रांस-जनरेशनल एपिजेनेटिक इनहेरिटेंस' कहता है।
यदि एक चूहे का डर सात पीढ़ियों तक चल सकता है, तो तुम तो मनुष्य हो। तुम्हारे दादा ने अगर बंटवारे का दंश झेला था, तो वह असुरक्षा आज तुम्हारे आलीशान फ्लैट में भी तुम्हें डराती है। तुम जो कंजूसी करते हो या जो पैसा जोड़ते जाते हो, वह तुम्हारी जरूरत नहीं, बल्कि तुम्हारे पूर्वजों की वह भूख और लाचारी है जो तुम्हारे माध्यम से जी रही है। पितृदोष का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पूर्वज किसी पेड़ पर लटके हैं; वे तुम्हारे डीएनए के डबल हेलिक्स में गुथे हुए हैं।
तुम्हारा शरीर ही नहीं, तुम्हारा मन भी उनका ही विस्तार है। जिसे डॉक्टर बीमारी कहते हैं, वह अक्सर एक 'इमोशनल पैटर्न' होता है। यदि तुम्हारे पूर्वजों ने जीवन को केवल एक युद्ध की तरह जिया, जहाँ मिठास के लिए कोई जगह नहीं थी, तो वही कड़वाहट आज तुम्हारे शरीर में 'शुगर' या डायबिटीज बनकर प्रकट होती है। समाज तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन कोई यह नहीं देखता कि तुम हजारों साल के बोझ के नीचे दबे एक यात्री हो। तुम एक ऐसी कठपुतली हो जिसका रिमोट कंट्रोल अतीत के हाथों में है।
लेकिन, अस्तित्व इतना क्रूर नहीं है। जिस विज्ञान ने तुम्हें यह बताया कि तुम गुलाम हो, उसी ने मुक्ति का द्वार भी खोला है। तुम्हारे जीन (Genes) पत्थर की लकीर नहीं हैं; वे एक स्विच बोर्ड की तरह हैं जिन्हें 'ऑन' या 'ऑफ' किया जा सकता है। तुम अपने भाग्य के रचयिता बन सकते हो।
पितृदोष से मुक्ति का मार्ग - पिंडदान
मुक्ति का मार्ग किसी मंदिर की रस्मों में नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनोविज्ञान को समझने में है। हमारे पूर्वजों ने 'पिंडदान' की बात की थी। इसका असली अर्थ है, अपने शरीर (पिंड) पर जमे पूर्वजों के प्रभाव को धन्यवाद देकर विदा करना। यह एक गहरी थेरेपी है। अपने भीतर उन पूर्वजों से संवाद करो, उनके दर्द का सम्मान करो, लेकिन उनको बताओ कि आप स्थिति बदल गई है, अब डरने की जरूरत नहीं है, मैं आपके साथ हूं, आपने निश्चिन्त हो जाओ"।
पितृदोष से मुक्ति का मार्ग - साक्षी भाव
तुम्हें 'साक्षी भाव' (Witnessing) में उतरना होगा। जब गुस्सा या उदासी आए, तो उसे 'मेरी' समस्या मत कहो; उसे एक 'पुराना पैटर्न' कहो। तुम आसमान हो, और ये भावनाएं केवल गुजरते हुए बादल हैं।
तुम्हें 'चेन ब्रेकर' (Chain Breaker) बनना है। तुम वह पहली कड़ी बन सकते हो जो सदियों से चली आ रही नफरत, डर और बीमारी को रोक दे ताकि तुम्हारी आने वाली पीढ़ी मुक्त पैदा हो सके। अपने माता-पिता को दोष देना बंद करो, उन्हें माफ कर दो, क्योंकि वे भी अपनी मजबूरियों के गुलाम थे। जिस दिन तुम जाग जाओगे, उसी दिन यह सात पीढ़ियों का अंधेरा मिट जाएगा। बस एक कदम उठाना है, होश का कदम।

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