यदि कोई विवाह के बाद सन्यासी बन जाए तो क्या जीवनसाथी दूसरी शादी कर सकता है- THE HINDU MARRIAGE ACT, 1955

वैदिक जीवन के चार आश्रम थे- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। सभी के लिए 25 वर्ष निर्धारित किए गए थे। यानी जन्म से 25 वर्ष तक ब्रम्हचर्य, 25 से 50 वर्ष तक गृहस्थ, 50 से 75 वर्ष तक वानप्रस्थ और उसके बाद सन्यास। यहां सन्यास से तात्पर्य सभी प्रकार की जिम्मेदारियों एवं अधिकारों से मुक्त हो जाना। कई बार कुछ युवा भी सन्यास धारण करते हैं। वह अपने सभी प्रकार के सामाजिक दायित्व एवं अधिकारों से मुक्त हो जाते हैं। यदि कोई विवाहित युवक सन्यास धारण कर ले, तब क्या उसकी पत्नी को वैधानिक रूप से तलाक प्राप्त हो सकता है, ताकि वह फिर से अपना वैवाहिक जीवन प्रारंभ कर सकें।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(vi) की परिभाषा:-

अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक आश्रम में प्रवेश करते हुए संन्यास धारण कर लेता है तब वह विवाह-विच्छेद (तलाक) का आठवाँ आधार हो सकता है।
इस आधार के लिए दो शर्ते होना अतिआवश्यक हैं:-
• यह कि व्यक्ति ने घर, परिवार सभी को पूर्ण रूप से त्याग दिया हो।
• व्यक्ति ने किसी धार्मिक आश्रम में किसी रीति या कर्मकांडों से प्रवेश कर लिया हो।

उधारानुसार- एक व्यक्ति जो पुजारी बन जाता हैं, फिर भी वह गृहस्था में भी बना रहता है। वह विवाह-विच्छेद (तालक) का आधार नहीं माना जायेगा क्योंकि उसने संन्यास नहीं लिया है वह अभी भी गृहस्था में बना हुआ है। अगर वह गृहस्था को पूर्ण रूप से छोड़ देता है तब वह तलाक का आठवां आधार होगा। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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