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जज, मजिस्ट्रेट और जस्टिस में क्या अंतर होता है, यहां पढ़िए CRPC एवं Cpc

आज के लेख में हम आपको जो जानकारी देने जा रहे हैं, यह जानकारी कानून के जानकार के अलावा शायद आम लोगों को पता नहीं होगी। 

आज हम आपको ऐसी सामान्य जानकारी देंगे, जिससे आपको हमेशा पता रहेगा की आप अपने किसी मामले को लेकर कौन से न्यायालय में जाना है। क्योंकि बहुत सी आम जनता को पता नहीं रहता है कि हमारे साथ जो अपराध या नुकसान हुआ है उसकी शिकायत हमे कहां और किस मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश के पास करनी है। 

केस या मामले दो प्रकार के होते हैं:-
1. सिविल केस या व्यवहारिक मामले।
2. क्रिमिनल केस(आपराधिक) या दण्डिक मामले।

(A). सिविल केस या व्यवहारिक मामले:- ऐसे मामले जिसमे, क्षतिपूर्ति की मांग की जाए, किसी नियुक्ति-पद के लिए वाद, तलाक या विवाह- विच्छेद, संविदा, सम्पत्ति वाद, प्रावधान संबंधी वाद,मानहानि आदि। मामले पर सुनवाई होती है, वह दीवानी मामले होते हैं। इनकी सुनवाई तहसील या निचली अदालत में सिविल जज करते हैं। एवं जिला स्तर पर जिला न्यायालय में, इनकी सुनवाई जिला न्यायाधीश द्वारा की जाती है।

(B). क्रिमिनल केस या फोजीदारी मामले:-  ऐसे मामले जिसमें किसी गंभीर अपराध के लिए दण्ड की मांग की जाए जैसे, हत्या, चोरी, लूट, धोखाधड़ी आदि आपराधिक मामले होते हैं। इनकी सुनवाई निचली अदालत या विकासखंड स्तर पर न्यायिक मजिस्ट्रेट करते हैं। जिला स्तर पर क्रिमिनल मामले की सुनवाई सेशन कोर्ट अर्थात सत्र न्यायालय में होती है। एवं जिले में क्रिमिनल मामले की सुनवाई का अधिकार सत्र न्यायाधीश को होता हैं।

नोट:- संपत्ति की क्षति या मानहानि आदि के मामले दोनो प्रकार के हो सकते हैं सिविल भी और आपराधिक भी।
इसी प्रकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जो जज किसी मामले की भी सुनवाई करते हैं उनको  न्यायमूर्ति (जस्टिस) कहा जाता है।
(यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी जो आम लोगों को हो सके उसके लिए है, सम्पूर्ण जानकारी के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 एवं दण्ड प्रक्रिया संहिता देखें।)  :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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