संपत्ति की रक्षा में हमलावर की हत्या कब क्षमायोग्य और कब अपराध, पढ़िए- IPC SECTION-103, 104

साधारण शब्दों में अगर हम बात करे तो हर व्यक्ति को अपनी एवं अपनी संपत्ति की रक्षा करने का अधिकार होता है। यह जानकारी हमने आपको पिछले लेखों में बता दी है। कभी-कभी स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि चोर, लुटेरों, डाकुओं, उपद्रवियों या हमलावरों से अपनी संपत्ति की रक्षा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि यदि इस संघर्ष के दौरान किसी हमलावर अपराधी की मृत्यु हो जाए तो क्या संपत्ति स्वामी को हत्यारा मानकर जेल में डाल दिया जाएगा। आइए आईपीसी से पूछते हैं:-

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 103 की परिभाषा:-

कोई व्यक्ति निम्न प्रकार से किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता हैं:-
1. चोरी करने के उद्देश्य से।
2. लूट करने के उद्देश्य से।
3. डकैती के उद्देश्य से।
4. रात्रि में जबर्दस्ती घर में घुसकर मारपीट या लूट करना।
4. मकान को रिष्टि करना आदि।
उपर्युक्त उद्देश्य से अगर व्यक्ति किसी पर हमला करता है और व्यक्ति अपनी निजी संपत्ति की रक्षा के लिए हमलावर की हत्या कर देता है तब यह अपराध उसका धारा 103 के अंतर्गत क्षमा योग्य होगा।

कब संपत्ति की रक्षा में हमलावर की हत्या अपराध मानी जाएगी:- 

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 104 की परिभाषा:-
अगर कोई चोर या कोई व्यक्ति जो मकान में बिना अनुमति के रात्रि गृह प्रवेश किया हुआ है, संपत्ति की रिष्टि या चोरी करने के उद्देश्य से आया है, तब वह कोई गंभीर अपराध को अन्जाम नहीं दे रहा है, अर्थात मकान में आकर गाली-गलौज मात्र करता है या घर में घुसकर कपड़े मात्र जलाता है या छोटा-मोटा समान चुराता हैं तब ऐसे संपत्ति की रक्षा के लिए व्यक्ति किसी की हत्या नहीं कर सकता है सिर्फ उपहति सामान्य चोट देकर रोक सकता हैं।

उधारानुसार निर्णायक वाद:- 1. भाजा प्रधान बनाम उड़ीसा राज्य:-

उक्त मामले में चोर, आरोपी की बकरी चुराकर भाग रहा था, आरोपी ने उसका पीछा किया और चोर को पकड़ कर बकरियां वापस ले लीं एवं चोर को बेरहमी से पीटा इस कारण चोर की मृत्यु हो गई। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि आरोपी ने चोर द्वारा चुराई गई संपत्ति को वापस प्राप्त करने के बाद अपनी प्रतिरक्षा के अधिकार का उल्लंघन किया था अतः आरोपी मानव वध का दोषी होगा।

2. गुरुदत्त मल बनाम राज्य:-

उक्त मामले में मृतक पुलिस के संरक्षण में एक खेत से शांतिपूर्वक फसल काट रहे थे एवं उनके पास किसी भी प्रकार के खतरनाक हथियार नहीं थे। आरोपी ने फसल पर अपना हक जताया तथा पर्याप्त समय होते हुए भी लोक-अधिकारियों की सहायता लेने के बजाय स्वयं ही उसने फसल काट रहे व्यक्ति पर बंदूक से फायर कर दिया एवं अन्य हथियार से भी उन्हें मार डाला। न्यायालय ने इस वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि मृतकगण न तो लूट का कोई अपराध कर रहे थे न ही डकैती का इसलिए आरोपी को धारा 103 के अंतर्गत किसी भी प्रकार का निजी प्रतिरक्षा का बचाव नहीं मिलेगा आरोपी के पास समय था वह पुलिस सहायता ले सकता था। 

"अर्थात धारा 103 के अंतर्गत संपत्ति के संरक्षण के लिए व्यक्ति को संपति की रक्षा के लिए संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है किन्तु इस अधिकार का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब पुलिस अधिकारी से सहायता प्राप्त या उनको सूचना देने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं हैं या चोर तुरंत घातक हथियार से व्यक्ति पर हमला कर रहा है। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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