घोटालों में घिरे BANK और उबरने के सुझाव | EDITORIAL

26 March 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश में नित नये बैंक घोटाले सामने आ रहे है और आरबीआई गवर्नर इस बात से दुखी हैं कि उन्हें सरकारी बैंकों के बोर्ड को हटाने के मामले में पूरे अधिकार नहीं हैं। उनकी इस बात को पूरी तरह अप्रासंगिक बता कर खारिज भी नहीं किया जा सकता है। क्या किसी भी निजी या सरकारी बैंक में धोखाधड़ी की घटना के बाद आत्मावलोकन नहीं होना चाहिए कि कहां गलती हो गई और नियामक द्वारा इससे कैसे बचा जा सकता था?  दूसरी बात क्या आरबीआई के पास बैंकों के बोर्ड के निदेशकों को हटाने का अधिकार न होने मात्र से ही धोखाधड़ी हो रही है? ऐसा भी नहीं है। धोखाधड़ी इससे रुक जाएगी, ऐसा मानना भी गलत है।

जब तक देश का चरित्र नहीं बदलता धोखाधड़ी तो किसी भी संस्थान में हो सकती है। चाहे उसका स्वामित्व किसी के पास हो। संस्थान को चलाया कैसे जा रहा है, इसके आधार पर यह जरूर कहा जा सकता है कि उसमें धोखाधड़ी की कितनी आशंका है। अगर धोखाधड़ी सरकारी बैंकों में होती है तो बैंक कर्मचारियों के सरकारी नौकर होने और सरकारी स्वामित्व के चलते केंद्रीय जांच और सतर्कता एजेंसियों की कथित  सख्त जांच के बावजूद यह कहना उचित होगा कि यह मॉडल समुचित नहीं है और इसमें सुधार किया जाना चाहिए। ऐसे में व्यवस्था में सुधार से जुड़ा सबसे बड़ा जोखिम यही है कि सरकारी बैंकों के स्वामित्व और उनके संचालन में सुधार का कोई भी प्रयास नकारा जा सकता है। ऐसे  धोखाधड़ी कीमामले  दलील के रूप में इस्तेमाल हो सकते है। 

वर्तमान परिस्थितियों में यह सुनिश्चित करना अहम है कि बैंकों में दोहरी जवाबदेही समाप्त हो। जैसा कि कहा जाता है कोई भी व्यक्ति दो मोर्चे नहीं संभाल सकता। अक्सर तात्कालिकता, अहमियत पर भारी पड़ जाती है। सही मायनों में सरकारी बैकों के कमजोर और अप्रभावी संचालन में सुधार पर गहरी और करीबी दृष्टि डालना जरूरी है। बैंकों के बोर्ड निदेशकों को नीतिगत नजर रखने वालों के बजाय पुलिसकर्मी के रूप में देखना भी बंद करना होगा।  इस सरकार के पास कानून बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत है। वह अहम कानून बनाने के लिए अध्यादेश ला सकती है, जरूरी कानूनों को धन विधेयक से जोड़कर उनमें गंभीर संशोधनों को प्रभावी कर सकती है। इससे उन्हें राज्य सभा की मंजूरी की आवश्यकता नहीं रह जाती। इन अधिकारों का इस्तेमाल सरकारी बैंकों में होना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त भगोड़ों को लेकर जिस गति से कानून बनाया जा रहा है उसे सरकारी बैंकों और उनके संचालन की गड़बडिय़ों को दूर करने के मामले में दोहराया जाना चाहिए। कम से कम एक सामान्य कानून ऐसा आना चाहिए जिसकी मदद से तमाम सरकारी बैंकों को ऐसी पब्लिक लिमिटेड कंपनी में बदला जा सके जिसका संचालन नए कंपनी अधिनियम के अधीन हो। इससे ये संस्थान अधिक प्रभावी हो सकेंगे, इनमें एकरूपता आएगी और कारोबारी प्रशासन के वे मानक लागू होंगे जो निजी बैंकों पर भी लागू हैं।

इसके बाद अगले कदम के रूप में इन बैकों में सरकार की हिस्सेदारी को कम किये जाने बाबत सोचा जा सकता है । इन बैंकों में सतर्कता और जांच संबंधी निगरानी समाप्त की जानी चाहिए क्योंकि इससे इन बैंकों में धोखाधड़ी रोकने में कोई मदद नहीं मिली है। बल्कि इस कारण बैंकों में ईमानदार अधिकारी इतने भयभीत रहते हैं कि वे कोई निर्णय नहीं ले पाते। इससे भी बैंक के हितों को ही नुकसान पहुंचता है। जो बैंक अधिकारी ऋण देने और उसे मंजूर करने का काम संभालते हैं उन्हें यह आशंका रहती है कि सतर्कता संबंधी जांच और भ्रष्टाचार के मामले उनका भविष्य  खराब कर देंगे।इस सारे मसले को राजनीतिक साहस और सूझबूझ से हल किया जा सकता है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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