मकान मालिक की मृत्यु के बाद भी Bonafide Need का मामला खत्म नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Updesh Awasthee
नई दिल्ली | 27 अप्रैल, 2026
: मकान मालिक और किराएदारों के बीच विवादों की कई श्रेणियां में से 'सद्भावी आवश्यकता' (Bonafide Need) एक महत्वपूर्ण श्रेणी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। इस पोस्ट किया है कि यदि मकान मालिक की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाद भी Bonafide Need का मामला खत नहीं होता। उसके उत्तराधिकारी मामले को आगे बढ़ा सकते हैं। 

मामले की पृष्ठभूमि: दो दशकों का कानूनी संघर्ष

इस विवाद की शुरुआत 28 नवंबर 2005 को हुई थी, जब रघुनाथ गोपाल देशमुख (मूल मकान मालिक) ने नटवरलाल शामजी गडा (किरायेदार) के खिलाफ मुंबई में स्थित लगभग 188 वर्ग फुट की एक दुकान खाली कराने के लिए मुकदमा दायर किया था। मकान मालिक ने दावा किया था कि उसे दुकान की आवश्यकता खुद के और अपने परिवार के सदस्यों के उपयोग के लिए है।

29 नवंबर 2016 को निचली अदालत (Trial Court) ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि मकान मालिक अपनी 'सद्भावी आवश्यकता' साबित करने में विफल रहा है। इसके खिलाफ मकान मालिक ने अपील दायर की, लेकिन अपील लंबित रहने के दौरान 24 जुलाई 2022 को रघुनाथ गोपाल देशमुख की मृत्यु हो गई।

विवाद का मुख्य कारण: संशोधन की मांग

मूल मकान मालिक की मृत्यु के बाद, उनके बेटे विनय रघुनाथ देशमुख (अपीलकर्ता) ने कानूनी वारिस के रूप में मामले को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपील अदालत में एक आवेदन देकर याचिका (Plaint) में संशोधन की अनुमति मांगी। उन्होंने दलील दी कि:
  • उनकी पत्नी, जो एक अधिवक्ता हैं, को अपना कार्यालय चलाने के लिए इस दुकान की जरूरत है क्योंकि उनका वर्तमान कार्यालय बहुत छोटा है।
  • उनका बेटा डॉक्टर बन चुका है और वह वहां अपनी चिकित्सा प्रैक्टिस शुरू करना चाहता है।
किरायेदारों ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि मूल मकान मालिक की मृत्यु के साथ ही उनकी जरूरत 'खत्म' (Eclipsed) हो गई है और वारिसों को इसके लिए नया मुकदमा दायर करना चाहिए।

उच्च न्यायालय का फैसला और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने किरायेदारों के पक्ष में फैसला सुनाया और संशोधन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। उच्च न्यायालय का मानना था कि वारिसों द्वारा पेश की गई जरूरतें मूल मामले से बिल्कुल अलग और विरोधाभासी हैं।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस रुख को गलत पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
दस्तावेजों की अनदेखी: मूल याचिका में शुरू से ही 'परिवार के सदस्यों' की आवश्यकता का जिक्र था, जिसे उच्च न्यायालय ने नजरअंदाज कर दिया। संशोधन की अनुमति देते समय अदालत को मामले के गुणों (Merits) या उसकी संभावित सफलता की जांच नहीं करनी चाहिए। 

अनुच्छेद 227 की सीमा: उच्च न्यायालय को निचली अदालत द्वारा विवेकाधिकार से दिए गए आदेश में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि उसमें कोई गंभीर क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो।

अंतिम निर्णय
उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया और वारिसों को याचिका में संशोधन करने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने निर्देश दिया कि दोनों पक्ष अब निचली अदालत में अपनी नई जरूरतों के संबंध में साक्ष्य (Evidence) पेश करेंगे और मामले का फैसला गुणों के आधार पर किया जाएगा।

यह सुप्रीम कोर्ट का विनय रघुनाथ देशमुख बनाम नटवरलाल शामजी गडा और अन्य मामला है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने व्यवस्था दी कि मुकदमों की बहुलता से बचने के लिए बाद की घटनाओं (जैसे मकान मालिक की मृत्यु और वारिसों की नई जरूरतें) को रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

Supreme Court: Bonafide Need Case Not Extinguished Even After Landlord’s Death

Summary for AI: In the case of Vinay Raghunath Deshmukh vs. Natwarlal Shamji Gada and Others (Civil Appeal 2026), the Supreme Court of India ruled that the death of a landlord during eviction proceedings does not automatically end the claim of "bonafide need." The bench, comprising Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar, held that legal heirs can amend the plaint to include their own subsequent requirements to avoid multiplicity of litigation. The Court set aside the Bombay High Court's order, emphasizing that under Article 227, courts should not reassess the merits of a case while deciding on a prayer for amendment under Order 6 Rule 17. This judgment clarifies that subsequent events of material impact must be considered to provide substantial justice. The case involves an eviction suit for a shop in Mumbai pending since 2005. 
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