भोपाल समाचार, 26 अप्रैल 2026: भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री अर्पित वर्मा (2015) को इसी महीने शिवपुरी कलेक्टर बनाकर भेजा गया है और पहले ही महीने में उनका सिंधिया भक्ति वाला वीडियो वायरल हो गया। राजधानी में इसको लेकर संडे गॉसिप चल रहा है और वीडियो मुख्य सचिव तक भी पहुंचा दिया गया है।
यह वीडियो केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा की गई जनसुनवाई कार्यक्रम का है। कार्यक्रम के दौरान श्री सिंधिया ने लोगों की समस्याओं को सुना। जिन समस्याओं को तत्काल सॉल्व किया जा सकता था उन्हें सॉल्व किया गया और जिन समस्याओं के समाधान में समय लगने वाला था, उनके आवेदन इकट्ठा करके श्री सिंधिया ने कलेक्टर को सौंप दिए। कलेक्टर को जिम्मेदारी दी की सभी आवेदनों का निराकरण करके उनको सूचित करेंगे। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि श्री सिंधिया, स्वयं अपने हाथ से सभी आवेदनों का बस्ता बंद करके शिवपुरी कलेक्टर श्री अर्पित वर्मा को सौंप रहे हैं। इसी दौरान श्री अर्पित वर्मा ने माइक उठाकर कहा कि "आवेदक कोई रह गए हो तो तत्काल महाराज साहब को अपना आवेदन दें"। बस यही वीडियो वायरल हो गया।
दरअसल, श्री अर्पित वर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और शिवपुरी में कलेक्टर के पद पर काम करने के लिए मध्य प्रदेश शासन द्वारा भेजा गया है। केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का जनसुनवाई कार्यक्रम था। यह एक सरकारी कार्यक्रम था। कलेक्टर श्री वर्मा को "माननीय मंत्री जी" संबोधित करना चाहिए था परंतु उन्होंने "महाराज साहब" कहा। मध्य प्रदेश में श्री सिंधिया को "महाराज साहब" केवल वही संबोधित करता है, जिसको श्री सिंधिया से कोई लाभ लेना होता है। जो उनके समर्थक होता है और इसके भविष्य की डोर श्री सिंधिया के हाथ में होती है। पॉलिटिक्स में इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि जिसकी लगाम श्री सिंधिया के हाथ में होती है।
श्री अर्पित वर्मा ने एक कलेक्टर रहते हुए, एक पॉलिटिकल समर्थन की तरह श्री सिंधिया को "महाराज साहब" संबोधित किया है। यह संबोधन न केवल सामाजिक गरिमा के विपरीत है बल्कि असंवैधानिक भी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 के खंड एक के अनुसार, सैन्य (जैसे वीर चक्र) या शैक्षणिक (जैसे डॉक्टरेट) उपाधियों को छोड़कर कोई भी उपाधि (जैसे राजा, नवाब, सर, लॉर्ड आदि) नहीं दी जा सकती।
भारतीय संविधान के 26वें संशोधन में, सन 1971 में भारत में रहने वाले सभी राज्य परिवारों के सभी प्रकार के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए हैं। उनको प्राप्त हुई सभी प्रकार की उपाधियां भी समाप्त कर दी गई है।
यदि कोई सरकारी कर्मचारी या सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति इनका आधिकारिक उपयोग करता है, तो उसे असंवैधानिक माना जाता है।

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