सेंट्रल न्यूज डेस्क, 28 अप्रैल 2026: यदि आप किसी अपराध की साजिश रच रहे हैं तो आपके खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता है और पुलिस आपको गिरफ्तार कर लेगी लेकिन यदि आप रिश्वत या भ्रष्टाचार की साजिश रच रहे हैं, तो कोई कार्रवाई नहीं होती। बिहार में बैंक के कर्मचारियों ने रिश्वत की लालच में एक अनपढ़ आदिवासी व्यक्ति को इतना परेशान किया कि वह, कब्र खोदकर अपनी बहन का कंकाल निकालकर बैंक ले आया। तब कहीं जाकर उसको आश्वासन मिला कि उसका काम हो जाएगा।
Bank Harassment Forces Illiterate Tribal Man to Dig Up Dead Sister’s Skeleton
ओडिशा राज्य के क्योंझर में पटना नाम का एक ब्लॉक है। (यह बिहार की राजधानी पटना नहीं है)। मामला पटना पुलिस स्टेशन का है। स्टेशन के प्रभारी निरीक्षक (आईआईसी) किरण प्रसाद साहू ने बताया कि उनके पास बैंक ब्रांच से एक फोन कॉल आया था। जब हमारी टीम ने जाकर देखा तो एक व्यक्ति बैंक के बरामदे में पोटली के साथ बैठा हुआ था। पूछताछ में पता चला कि उसका नाम जीतू मुंडा उम्र 55 वर्ष है। वह अनपढ़ है और सरकारी कामकाज के बारे में बिल्कुल नहीं जानता है। उसकी बहन का नाम कलारा मुंडा था, जिसकी मृत्यु हो चुकी है। पोटली के अंदर उसी का कंकाल रखा हुआ था। जीतू ने पुलिस को बताया कि उसकी बहन के बैंक अकाउंट में ₹20000 जमा है। बहन की मृत्यु हो गई है और उसने बैंक वालों को इसकी सूचना भी दे दी है, लेकिन बैंक वाले उसकी बहन के खाते में जहां ₹20000 निकाल कर नहीं दे रहे हैं। बैंक वाले कहते थे कि, खाताधारक को लेकर आओ तभी पैसे मिलेंगे। इसलिए वह खाताधारक के कंकाल को कब्र से निकाल कर बैंक में ले आया है।
बैंक वालों ने पुलिस को बताया कि, यह बात सही है कि खाताधारक कलारा मुंडा के बैंक अकाउंट में ₹20000 जमा है। यह भी सही है कि, बैंक की जानकारी में है कि उसकी मृत्यु हो गई है। नियम के अनुसार बैंक में जमा रकम उसके नॉमिनी को दी जा सकती है लेकिन उसके नाम ही नहीं पति और बेटे की भी मृत्यु हो चुकी है। इसलिए जीतू को पैसे नहीं दिए जा रहे थे।
यह भ्रष्टाचार की साजिश का मामला है
अब तक की कहानी मैं आपको समझ में आया? यह भ्रष्टाचार की साजिश का मामला है। बैंक कर्मचारियों को पता था कि जीतू आदिवासी अनपढ़ है। वह नियम नहीं जानता इसलिए उसको नियमों की जानकारी दी ही नहीं गई। बैंक के कर्मचारी लगातार उसको यह बताते रही कि नॉमिनी बदलने के लिए खाताधारक को ब्रांच में लाना पड़ेगा। जबकि बैंक कर्मचारियों को पता था कि, खाताधारक की मृत्यु हो चुकी है। इसके बाद भी वह " नॉमिनी बदलने के लिए खाताधारक को ब्रांच में लाना पड़ेगा" बोलते रहे। दरअसल, यह इसलिए बोला जा रहा था ताकि जीतू आदिवासी रिश्वत देने के लिए तैयार हो जाए और फिर उत्तराधिकार नियम के तहत उसकी उसकी बहन के बैंक खाते का पैसा दे दिया जाएगा। इस बात का खुलासा भी हुआ।
पुलिस ने जब इन्वेस्टिगेशन की तो पता चला कि जीतू आदिवासी, अपनी बहन का एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी है। इस हिसाब से बहन के बैंक अकाउंट में जमा पैसों पर उसका अधिकार होता है, लेकिन इसके लिए नॉमिनी बदलने की जरूरत नहीं है। उत्तराधिकार संबंधी कार्रवाई करने के बाद बैंक में जमा रकम और संपत्ति इत्यादि सब कुछ दिया जा सकता है। पुलिस ने जीतू आदिवासियों को आश्वासन दिया कि वह, उत्तराधिकार की कार्रवाई करने में उसकी मदद करेंगे और बैंक खाते में जमा पैसा दिलवाएंगे। तब कहीं जाकर मामला सॉल्व हुआ और जीतू आदिवासी ने अपनी बहन के कंकाल को वापस कब्रिस्तान में दफन किया।
यह हैप्पी एंडिंग नहीं है, यहां से एक सवाल खड़ा होता है। बैंक की ब्रांच ने जीतू आदिवासी को, उत्तराधिकार के बारे में क्यों नहीं बताया। जबकि यह उनकी जिम्मेदारी है।
यहां एक और गौर करने वाली बात है। जब जीतू आदिवासी अपनी मरी हुई बहन का कंकाल लेकर आया तब भी, बैंक वालों ने उसे उसकी बहन के खाते से पैसे निकाल कर देने का आश्वासन नहीं दिया बल्कि पुलिस को बुलाकर उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। यदि पुलिस सदभावना पूर्वक मामले का निराकरण नहीं करती, तो जीतू आदिवासी आज जेल में होता।
पुलिस इन्वेस्टिगेशन में यह स्पष्ट हो चुका है कि बैंक के कर्मचारियों ने जीतू आदिवासी को उचित मार्गदर्शन नहीं दिया, उल्टा परेशान किया। जब खाताधारक की मृत्यु हो गई है तो फिर नॉमिनी का प्रश्न ही नहीं उठाता। इस मामले में जीतू उसकी बहन के खाते में जमा पैसे मिल जाएंगे लेकिन जीतू आदिवासी को तंग करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
मतलब अगली बार फिर कोई दूसरा जीतू आदिवासी आएगा तो उसको भी ऐसे ही परेशान किया जाएगा क्योंकि भारत में रिश्वत के लिए आम आदमी को तंग करने का कोई मामला दर्ज ही नहीं किया जाता।
यह मामला Bank Harassment,संवेदनहीनता की इंतिहा, Rules vs Humanity, Human Rights Issue, Financial Inclusion Failure, Tribal & Illiteracy Factor और Administrative Accountability, इन सभी श्रेणियां में आता है। विचार करना जरूरी है कि, क्या कोई ऐसा सिस्टम बनाया जा सकता है ताकि जीतू आदिवासी लोग जैसे लोगों को इस प्रकार से तंग ना किया जा सके।

