भोपाल समाचार, 6 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश की बौद्धिक संपत्ति, भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव ने जातिवाद की राजनीति और आरक्षण का लाभ लेने वाले लोगों की संतानों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है, इत्यादि कई प्रश्नों को लेकर गजब की रिसर्च की है। श्री मनोज श्रीवास्तव का यह अध्ययन, उन सभी बुद्धिजीवियों के लिए उपयोगी है, जो अपनी आने वाली पीढियां को "लीगेसी ट्रैप" से बचाकर लाभान्वित के स्थान पर योग्य बनना चाहते हैं। कृपया दो-तीन बार पढ़िए क्योंकि श्री मनोज श्रीवास्तव ने बहुत बड़े अध्ययन को बहुत संक्षिप्त में प्रस्तुत कर दिया है:-
जातीय स्मृति किसी भी संस्कृति और सभ्यता की सबसे बड़ी रक्षक होती है। पर तीन सौ वर्षों से इस जातीय स्मृति के टुकड़े टुकड़े करने का अभियान चल रहा है। कुछ लोगों को शम्बूक की कथा की व्यावहारिक पूँजी बनाना आता है, कुछ लोगों को वृत्र या विश्वरूप की कथा को नौकरी या शिक्षा के अवसरों में बदलना नहीं आता, उन्हें यह हास्यास्पद लगता है। कुछ लोग ‘ढोल गँवार शूद्र पशु नारी’ से राजनीतिक कमाई कर लेंगे। कुछ लोग ‘कोटि बिप्र बध लागहि जाहू’ को पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।
कुछ लोग एकलव्य और कर्ण की कथा की रिट्रोफिटिंग कर लेते हैं, कुछ लोग असुरों द्वारा बार बार उनके पूर्वजों की हड्डियों के ढेर लगाने की भी नहीं करते।
क्या यह इन दूसरे लोगों की कमजोरी है या उनकी शक्ति? एक जिसे अत्याचार मान कर सदियों विलाप करता है, दूसरे पर वही जब घटता है तब वह उससे अपने आत्म-छवि को कुंठित नहीं करता।
मनोवैज्ञानिक रॉय बाउमिस्टर का “विक्टिम्स ओलंपिक्स” पर शोध चेतावनी देता है कि जब विक्टिमहुड स्टेटस और लाभ प्रदान करता है, तो यह समूहों को अपनी शिकायतों पर जोर देने और सुलह का विरोध करने के लिए मनोवैज्ञानिक प्रोत्साहन भी पैदा करता है।
सेलेक्टिव मान्यता, विक्टिमहुड के इंस्ट्रुमेंटल मूल्य को प्रदर्शित करके, विडंबनापूर्ण रूप से अन्य समूहों को, बजाय उन्नति के वैकल्पिक मार्गों का पीछा करने के, अपने खुद के विक्टिम होने के दावों को तीव्र करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
पर जो समूह इस ओलंपिक्स में भाग लेने से इनकार कर दिये, क्या अब उन समूहों का आदर पुनर्स्थापित करने का समय नहीं आ पहुँचा है?
मनोवैज्ञानिक डैन बर-ऑन ने होलोकॉस्ट से बच गये लोगों और नाजी अपराधियों दोनों के वंशजों के साथ शोध किया है। उन्होंने पाया कि पूर्वजों के विक्टिमहुड पर निरंतर ध्यान कभी-कभी बाद की पीढ़ियों में स्वस्थ आइडेंटिटी के विकास को बाधित कर सकता है, जिससे “लीगेसी ट्रैप” की स्थिति पैदा होती है, जहां व्यक्ति, बजाय स्वायत्त पहचान विकसित करने के, पूर्वजों के आघात को आगे ले जाने के लिए बाध्य महसूस करते हैं।
समाजशास्त्री चार्ल्स टिली का अध्ययन एक बड़ी दिलचस्प बात कहता है। उसकी स्टडी दर्शाती है कि सफल दावे-निर्माण के लिए संगठन, संसाधन, राजनीतिक अवसर और प्रभावी फ्रेमिंग की आवश्यकता होती है। यानी अशक्त बताये जाने के लिए सशक्त होना आवश्यक होता है।
वे समूह जो सफलतापूर्वक विक्टिमहुड स्वीकार्यता प्राप्त करते हैं, आमतौर पर इन तत्वों के पास ये सब साधन होते हैं।
यानी सेलेक्टिव मान्यता वस्तुनिष्ठ विक्टिमहुड की Hierarchy के बजाय इन समूहों की सामाजिक आंदोलन क्षमता को प्रतिबिंबित करती है।

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