कानून की किताब में धर्म, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता क्या है, जानिए- Fundamental Rights

कहते हैं कि धर्म अंत:करण का विषय हैं इसे किसी पर जबर्दस्ती थोपा नहीं जा सकता है। इसका सीधा संबंध मन अर्थात आत्मा से होता है। मानकर कभी पूजा, अर्चना एवं आराधना नहीं कि जाती है। इसी कारण हमारे संविधान में सभी धर्मों को पूज्य माना गया है। प्राचीन काल के विद्वानों ने कहां है कि धर्म एक है, ईश्वर भी एक है, चाहे हम राम कहे या रहिम। बस उस तक पहुंचने के मार्ग अलग अलग है। 

धर्म क्या है जानिए:-

वैसे धर्म की परिभाषा करना बहुत कठिन है क्योंकि इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है लेकिन सामान्य आर्थो में कहे तो" धारयते इति धर्म: आर्थत जो धारण किया जाये वही धर्म है, अतः जो अच्छा लगे वही धर्म है।

धर्म निरपेक्षता क्या है जानिए:-

भारत सभी धर्मों का पोषक हैं यह किसी एक धर्म विशेष को प्राथमिकता नहीं देता है एवं न ही किसी व्यक्ति पर किसी धर्म विशेष को थोपता हैं। न धर्म निरपेक्षता ईश्वर विरोधी हैं न ईश्वर समर्थक। यह आस्तिक को भी मानता है और नास्तिक को भी। अगर कोई व्यक्ति नास्तिक हैं तो उसका धर्म वही है और आस्तिक हैं तो वही उसका धर्म हैं एवं भारत राष्ट्र सभी को मान्यता देगा यही धर्म-निरपेक्षता हैं।

भारतीय संविधान अधिनियम, 1950 के अनुच्छेद 25 की कानूनी परिभाषा

प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतंत्रता हैं कि वह अपने अनुसार किसी भी धर्म को मान सकते हैं एवं उसे यह भी स्वतंत्रता हैं कि वह चाहे जिस माध्यम से ईश्वर से संबंध स्थापित कर सकते हैं इतना ही नहीं उसे किसी भी धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास व्यक्त करने की, कर्म कांड करने की, प्रचार प्रसार करने की, तीज त्यौहार मानने, अनुष्ठान आदि करने की पूर्ण स्वतंत्रता हैं। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) :- लेखक ✍️बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665

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