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यदि कोर्ट में अपराध सिद्ध हो जाए लेकिन साक्ष्य कमजोर हो तो क्या आरोपी बरी हो जाएगा - LEARN IPC SECTION 72

भारत में किसी भी प्रकार का अपराध होने पर पुलिस द्वारा प्रकरण दर्ज किया जाता है। इन्वेस्टिगेशन अधिकारी अपनी क्षमता और योग्यता के आधार पर जांच करता है एवं अपराधी के खिलाफ साक्ष्य एकत्रित करता है। कई बार उसकी कोशिश असफल हो जाती है। उसके द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत किए गए प्रमाण कमजोर साबित होते हैं लेकिन गवाहों के बयान अथवा अन्य कारणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अपराध हुआ है एवं अपराधी द्वारा ही किया गया है तब ऐसी स्थिति में कोर्ट क्या फैसला लेगा। क्या साक्ष्य के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया जाएगा अथवा कोई और रास्ता भी है।

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 72 की परिभाषा:-

अगर पुलिस के आरोप पत्र या किसी अन्य सबूतों द्वारा यह साबित हो गया है कि आरोपी ने किसी अपराध को अंजाम दिया है, लेकिन न्यायालय एविडेंस (साक्ष्यों) या सबूतों के आधार पर चलता है। न्यायालय को लगता है कि आरोप के सबूतों के कुछ संदेह लग रहा है यह सही भी हो सकते हैं या गलत। तब न्यायालय अपने अंतिम निर्णय की सुनवाई में आरोपी को बाइज्जत बरी नहीं करेगा बल्कि उसे उन अपराधों जो उस पर लगाये गए हैं उसकी सबसे कम सजा वाले अपराध से दाण्डित करेगा। 

अर्थात- चोरी के अपराध धारा 379 में आरोपी को गिरफ्तार किया गया था और सबूतों में न्यायालय को संदेह लगता है तब न्यायालय बिना अनुमति गृह अतिचार करने की धारा 448 से दण्डित करे आरोपी को न कि उसे छोड़ देगा। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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