सादर प्रणाम! श्रीमान जी निश्चित रूप से आप अवगत होंगे की कल दिनांक को 'हमारे शिक्षक ऐप' लॉगआउट के समय पर सर्वर फेल हो जाने के कारण रात 8:00 बजे तक शिक्षक लॉग आउट के लिए परेशान होते रहे। जब आयुक्त डीपीआई तक यह सूचना उनके मातहत कर्मचारियों के माध्यम से पहुंची होगी तो फरमान जारी हुआ कि अब लॉग आउट के लिए लोकेशन की आवश्यकता नहीं है जो जहां है वहीं से लोग आउट हो जाएं।
मध्य प्रदेश में इन दिनों शिक्षक बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा ई-अटेंडेंस एप से जूझते दिखाई दे रहे हैं। सुबह विद्यालय पहुँचते ही पहला सवाल यह नहीं होता कि आज बच्चों को क्या पढ़ाना है, बल्कि यह होता है “आज लॉगिन हो रहा है या नहीं?” कभी लॉगिन के समय सर्वर गायब, कभी लॉगआउट के समय सर्वर नदारद, कभी समय दर्ज नहीं होता तो कभी दर्ज समय में ही गड़बड़ी दिखाई देती है। शिक्षक अपनी तरफ से समय पर विद्यालय पहुँचकर उपस्थिति दर्ज करने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन सर्वर अपनी मर्जी से चलता है।
"सबसे मजेदार बात यह है कि सर्वर की खराबी का कोई हिसाब नहीं, लेकिन शिक्षक की एक मिनट की देरी का पूरा हिसाब है।" आखिर यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें शिक्षक को बच्चों के बीच रहने के बजाय मोबाइल लेकर नेटवर्क ढूँढना पड़ रहा है? जिसे पाठ पढ़ाना चाहिए, वह बार-बार एप खोल रहा है; जिसे बच्चों की कॉपियाँ जाँचनी चाहिए, वह यह देख रहा है कि उसकी उपस्थिति दर्ज हुई या नहीं। और तमाम कोशिशों के बाद भी यदि लॉगिन या लॉगआउट नहीं हुआ तो चिंता फिर शिक्षक की, “अब अधिकारी क्या कहेंगे?” कभी किसी ने यह पूछने की जहमत उठाई कि सर्वर से कौन पूछेगा?
अब बात थोड़ी कड़वी है, इसलिए सीधे कहनी पड़ेगी। "शिक्षक संगठनों के उन मुखियाओं से भी सवाल है, जो अधिकारियों के स्वागत में फूलमाला लेकर सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं, कभी उन फूलमालाओं का एक हार शिक्षकों की समस्याओं के लिए भी निकालिए। अधिकारी आए तो माला तैयार, अधिकारी जाएँ तो फोटो तैयार, मंच मिले तो स्वागत तैयार; लेकिन जब हजारों शिक्षक किसी समस्या से परेशान हों, तब आवाज कहाँ चली जाती है? क्या शिक्षक संगठन इसलिए बना है कि अधिकारी आएँ तो स्वागत हो और शिक्षक परेशान हों तो चुप्पी साध ली जाए?
संगठन के मुखिया को फूलमाला कुछ समय के लिए नीचे रखनी पड़ेगी और रीढ़ की हड्डी सीधी करनी पड़ेगी।
अधिकारियों का सम्मान करने में किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन सम्मान और चापलूसी में अंतर होता है।
यदि किसी शिक्षक संगठन का नेतृत्व हर बार अधिकारियों के स्वागत में तो सबसे आगे दिखाई दे, लेकिन शिक्षकों की वास्तविक समस्याओं पर सवाल पूछने के समय पीछे हट जाए, तो फिर ऐसे नेतृत्व से शिक्षक आखिर उम्मीद भी क्या रखें? शिक्षक को अपना काम करना है, बच्चों को पढ़ाना है, परीक्षा की तैयारी करानी है, कॉपियाँ जाँचनी हैं, शैक्षणिक गतिविधियाँ करनी हैं और बच्चों का भविष्य बनाना है। उसे हर सुबह ई-अटेंडेंस का चौकीदार बनाकर मोबाइल स्क्रीन पर “Login Successful” और “Logout Successful” खोजते रहने के लिए नियुक्त नहीं किया गया है।
ई-अटेंडेंस चले, डिजिटल व्यवस्था हो, तकनीक का इस्तेमाल हो, किसी को आपत्ति नहीं है। लेकिन तकनीक शिक्षक की सुविधा के लिए होनी चाहिए, शिक्षक को तकनीक का बंधक बनाने के लिए नहीं। सर्वर जब चाहे तब बंद हो सकता है, एप जब चाहे तब परेशान कर सकता है, लेकिन शिक्षक को उसकी तकनीकी विफलता का दोषी बनाना बिल्कुल स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
कृपया इस पत्र को आवेदन, निवेदन, ज्ञापन, और 5 लाख शिक्षकों के फ्रस्ट्रेशन समझें एवं इसी के आधार पर कार्रवाई करें, क्योंकि अब हम आंदोलन करने नहीं आएंगे, जब आपकी पार्टी के लोग घर आएंगे, तब उनसे कहेंगे कि अपने मंत्री जी से आज की अटेंडेंस लगवाओ।
पत्र लेखक: सुबोध मिश्रा "जनक" एवं समस्त शिक्षक जो शैक्षणिक कार्य करना चाहते हैं।
अस्वीकरण: खुला-खत एक ओपन प्लेटफार्म है। यहां मध्य प्रदेश के सभी जागरूक नागरिक सरकारी नीतियों की समीक्षा करते हैं। सुझाव देते हैं एवं समस्याओं की जानकारी देते हैं। पत्र लेखक के विचार उसके निजी होते हैं। यदि आपके पास भी है कुछ ऐसा जो मध्य प्रदेश के हित में हो, तो कृपया लिख भेजिए हमारा ई-पता है:- editorbhopalsamachar@gmail.com

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