मध्य प्रदेश की राजनीति में रुचि रखने वाले, यह तो जानते हैं कि श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, भोपाल को अपनी राजधानी बनाना चाहते हैं। इससे पहले उनके पिता स्वर्गीय श्री माधवराव सिंधिया भी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, भोपाल को अपनी राजधानी बनाना चाहते थे। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि, यह केवल दो पीढ़ी की बात नहीं है। पिछले 213 साल से सिंधिया राजवंश के लोग भोपाल पर कब्जा करना चाहते हैं, लेकिन ना तो 1813 में सफल हो पाए थे और ना ही 2023 में।
Siege of Bhopal: 1812–1813
यह इतिहास की बात है और इसको किसी के सम्मान या परदेदारी के साथ नहीं लिखा जा सकता। जो घटनाक्रम जैसा है उसको वैसा ही लिखना पड़ेगा। तो कहानी शुरू होती है 1812 से। दौलतराव सिंधिया के सेनापति जगू बापू (Jagoo Bapu) और नागपुर के सेनापति सादिया खान ने लगभग 50,000 से अधिक सैनिकों और भारी तोपखाने के साथ भोपाल शहर को चारों तरफ से घेर लिया था। उनकी रणनीति थी कि ऐसा करने से भोपाल की रसद (खान-पान) की आपूर्ति बंद हो जाएगी और भोपाल के नवाब को मजबूरी में सरेंडर करना होगा। यह सब कुछ हिंदुओं की रक्षा या स्वराज के लिए नहीं किया जा रहा था। भोपाल की हिंदू जनता के कल्याण के लिए नहीं किया जा रहा था बल्कि भोपाल को अपना करद (Tax-paying tributary) राज्य बनाने के लिए किया जा रहा था। मतलब नवाब को युद्ध में पराजित करने के बाद, फिर से भोपाल का नवाब बना दिया जाएगा और भोपाल की जनता पर 25% टैक्स बढ़ा दिया जाएगा, यह अतिरिक्त टैक्स महाराजा सिंधिया के खजाने में जाएगा।
भोपाल की जनता ने सिंधिया की सेना को खदेड़ दिया
यह घेराबंदी भारत के सैन्य इतिहास की सबसे कठिन घेराबंदियों में से एक मानी जाती है। कोई भी युद्ध रणनीतिकार इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं करेगा कि, भोपाल के वज़ीर मोहम्मद खान ने सिर्फ 1000 सैनिकों के नेतृत्व में भोपाल की जनता को इस प्रकार अनुशासित किया कि, सिंधिया के 50000 से अधिक सैनिक और भारी तोपखाने को उल्टे पांव वापस लौटना पड़ा।
military campaigns of 1813–1814
सेना का इस प्रकार वापस आना दौलतराव सिंधिया के अहंकार को घायल कर गया। उन्होंने तत्काल अपने फ्रांसीसी/यूरोपीय मूल के सेनापति जोन बैप्टिस्ट फिलोज़ (Jean Baptiste Filose) और यशवंतराव भाऊ को भोपाल पर पुनः हमला करने भेजा। इस बार सिंधिया की सेना ने रणनीति बदलकर हमला किया एवं इस्लामनगर और इस्लामगढ़ पर कब्जा कर लिया। सिंधिया के दोनों सेनापति जोन बैप्टिस्ट फिलोज़ और यशवंतराव भाऊ के बीच बहुत अधिक मतभेद थे लेकिन फिर भी दोनों कुशल सेनापति थे। एक लड़ाई के बाद हुए दूसरे हमले ने भोपाल को तोड़ दिया। नवाब को भोपाल का पतन तय लगने लगा, तब भोपाल के वज़ीर मोहम्मद खान ने ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेज़ों) से सुरक्षा की गुहार लगाई।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भोपाल को सिंधिया से बचाया
ईस्ट इंडिया कंपनी के रेसिडेंट आर. स्ट्रैची (R. Strachey) और तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने दौलतराव सिंधिया को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने भोपाल पर नियंत्रण करने का प्रयास किया, अथवा तत्काल अपनी सेना को वहां से वापस नहीं बुलाया तो ईस्ट इंडिया कंपनी उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करेगी। ईस्ट इंडिया कंपनी की चेतावनी मिलते ही दौलतराव सिंधिया ने अपनी सेना को भोपाल से वापस आने का हुक्म दे दिया।
Treaty of Raisen: भोपाल सिंधिया से बचा तो कंपनी का गुलाम हो गया
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भोपाल को सिंधिया के हमले से तो बचा लिया लेकिन भोपाल की किस्मत में अब आजादी नहीं थी। ईस्ट इंडिया कंपनी समझ चुकी थी कि, भोपाल एक कमजोर रियासत है और पड़ोसी सिंधिया की उसे पर नजर है। हालांकि सिंधिया की अंग्रेजों से दोस्ती थी लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी किसी भी कीमत पर सिंधिया को पावरफुल नहीं बनाना चाहती थी, इसलिए रियासत-ए-भोपाल को सिक्योरिटी दे रही थी परंतु जब उसको पता चला कि भोपाल का नवाब बहुत ही ज्यादा कमजोर है, तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने भोपाल के नवाब को अपना Puppet Ruler बनाने का फैसला किया। मतलब कहने को भोपाल पर नवाब का शासन रहेगा लेकिन एक्चुअल में ईस्ट इंडिया कंपनी शासन करेगी। इसी के चलते 1818 में रायसेन की संधि (Treaty of Raisen) की गई।
इस प्रकार भोपाल सिंधिया की गुलामी से तो बच गया लेकिन अंग्रेजों का गुलाम हो गया। इसके बाद की तो कहानी आपको पता ही है। किस प्रकार स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के मित्र श्री माधवराव सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। शपथ ग्रहण करने के लिए वह दिल्ली से भोपाल तक आ गए थे, लेकिन अंतिम समय में फैसला बदला और दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया। 2018 में इसी प्रकार श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राहुल गांधी की मित्रता का लाभ उठाकर मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने भोपाल में अपना ऑफिस भी खोल लिया था लेकिन अंतिम समय में कांग्रेस के विधायकों ने कमलनाथ को अपना नेता चुना और सिंधिया को वापस ग्वालियर जाना पड़ा। इस प्रकार पिछले 213 सालों से सिंधिया परिवार के लोग भोपाल को अपनी राजधानी बनाने और भोपाल पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। यहां जोड़ना जरूरी है कि, यह कहानी का अंत नहीं है। पिक्चर अभी बाकी है... शोध एवं अनुसंधान: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार।)
प्रामाणिक ऐतिहासिक संदर्भ पुस्तकें
A History of the Mahrattas (Vol. III) – James Grant Duff
संदर्भ: इसमें दौलतराव सिंधिया और नागपुर के भोंसले द्वारा 1807 से 1814 के बीच भोपाल पर किए गए हमलों और 1812 की घेराबंदी (Siege of Bhopal) का विस्तृत विवरण दिया गया है।
A Memoir of Central India, Including Malwa, and Adjoining Provinces (Vol. I & II) – Sir John Malcolm (1823)
संदर्भ: जॉन माल्कम ने भोपाल रियासत और सिंधिया के संबंधों, वज़ीर मोहम्मद खान की घेराबंदी और फ्रांसीसी कमांडर जॉन बैप्टिस्ट के सैन्य अभियानों का प्राथमिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड लिखा है।
The History of the British Empire in India – Edward Thornton
संदर्भ: इसमें सिंधिया की सेनाओं द्वारा भोपाल की घेराबंदी और उसके बाद ब्रिटिश कूटनीतिक हस्तक्षेप का उल्लेख है।
Bhopal State Gazetteer (Central India State Gazetter Series) – C.E. Luard (1908)
संदर्भ: यह एक आधिकारिक प्रशासनिक दस्तावेज़ (Imperial Gazetteer) है, जिसमें राहतगढ़, इस्लामनगर पर सिंधिया के कब्ज़े और भोपाल शहर पर जगू बापू द्वारा डाले गए घेरे की आधिकारिक समयरेखा दर्ज है।
The History of Bhopal (Taj-ul Ikbal Tarikh Bhopal) – Shah Jahan Begum (भोपाल की बेगम द्वारा लिखित इतिहास)
संदर्भ: इसमें भोपाल की तरफ से सिंधिया की सेना के खिलाफ किए गए रक्षात्मक युद्धों का विवरण मिलता है।

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