मध्य प्रदेश के उज्जैन में है एक रहस्यमई टीला, 1939 में अचानक खुदाई रुक गई थी, अब फिर से होगी

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 14 अगस्त 2026
: मध्य प्रदेश एक प्राचीन धरती है जहां द्वापर युग से संपन्न और समृद्ध जीवन के प्रमाण मिलते हैं। यहां हर 100 किलोमीटर के क्षेत्र में कोई ना कोई रहस्य जरूर मिल जाता है। बाबा महाकाल के उज्जैन में भी एक रहस्यमई टीला है। सन 1939 में इसकी खुदाई शुरू की गई थी, लेकिन पर अचानक रोक दी गई थी। अब मध्य प्रदेश एक बार फिर इस टीले की मिट्टी हटाकर पता करना चाहती है कि इसके अंदर क्या है। 

90 साल बाद भी जिज्ञासा उतनी ही प्रबल है

यह टीला, जिसे वैश्य टेकरी (Vaishya Tekri) के नाम से जाना जाता है, सांची के महान स्तूप से भी बड़ा, 2,000 साल से भी अधिक पुराना और सम्राट अशोक के उज्जैन प्रवास से जुड़ा हो सकता है। लगभग नौ दशकों से, मध्य प्रदेश के सबसे बड़े पुरातात्विक रहस्यों (archaeological mysteries) में से एक, उज्जैन के बाहरी इलाके में एक विशाल टीले के नीचे छिपा हुआ है। पिछले 90 साल से लोगों में, इस टीले के बारे में जानने के लिए जिज्ञासा उतनी ही प्रबल है।

Comparison between Vaishya Tekri and Sanchi Stupa dimensions

वर्ष 1938-39 की खुदाई के दौरान दर्ज किए गए आंकड़े असाधारण थे। जिस मुख्य टीले में स्तूप होने का अनुमान है, उसका व्यास (diameter) लगभग 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट आंकी गई थी। इसकी तुलना में, सांची का महान स्तूप लगभग 120 फीट व्यास और 54 फीट ऊंचा है। यदि आधुनिक खुदाई में ये पुराने माप सही साबित होते हैं, तो वैश्य टेकरी प्राचीन मध्य भारत में बौद्ध धर्म की पुरातात्विक समझ को पूरी तरह से बदल सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की संयुक्त महानिदेशक नंदिनी भट्टाचार्य का कहना है कि हालांकि पुराने साक्ष्य सांची से बड़े स्तूप की ओर इशारा करते हैं, लेकिन खुदाई के बिना इसे तथ्य नहीं माना जा सकता। 

Connection of Emperor Ashoka and Queen Devi with Vaishya Tekri Ujjain

परंपरागत रूप से वैश्य टेकरी को मौर्य काल और सम्राट अशोक से जोड़ा जाता है, जो राजा बनने से पहले उज्जैन के गवर्नर थे। कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, यहाँ बौद्ध स्मारक का निर्माण अशोक की पत्नी देवी ने करवाया था, जो विदिशा के एक धनी व्यापारी की बेटी थीं। विद्वानों ने इस स्थल को बौद्ध परंपराओं में वर्णित 'कनकगिरि विहार' (Kanakgiri Vihara) और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Hiuen Tsang) द्वारा वर्णित एक विशाल स्तूप से भी जोड़ने की कोशिश की है, हालांकि ये अभी केवल परिकल्पनाएँ हैं। 

Unique architecture and mystery of 1939 Vaishya Tekri excavation

विचित्र वास्तुकला और अधूरा उत्खनन 1938-39 की खुदाई में कुछ बेहद असामान्य चीज़ें मिली थीं। रिपोर्ट के अनुसार, वहाँ एक विशाल गोलाकार टीला मिला जो एक आयताकार गड्ढे से घिरा हुआ था। खुदाई में एक मुख्य स्तूप और दो छोटे स्तूपों के अवशेष मिले। इस मुख्य संरचना का निर्माण अन्य स्मारकों की तरह सामान्य चिनाई (masonry) वाला नहीं था; इसका केंद्र (core) मजबूती से कुटी गई स्थानीय मुरुम (rammed murum) से बना था, जबकि बाहरी हिस्सा मिट्टी के गारे में लगी बड़ी ईंटों से ढका था। आधार पर, एक विशेष कटोरे के आकार की चिनाई (bowl-shaped masonry) मिली थी, जिसे टीले के भारी दबाव को सहने के लिए बनाया गया था। लेकिन 1939 में खुदाई तब रोक दी गई जब वहां काम कर रहे मजदूर अचानक बेहोश हो गए थे, जिसके बाद से यह काम कभी पूरा नहीं हो सका। 

Government plans and challenges for Vaishya Tekri excavation

अब 90 साल बाद, मध्य प्रदेश सरकार फिर से इस रहस्य को सुलझाने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस स्थल के नए सिरे से अन्वेषण पर जोर दिया है और राज्य सरकार ASI के साथ मिलकर व्यवस्थित उत्खनन की संभावना पर काम कर रही है। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। उज्जैन संभाग आयुक्त आशीष सिंह के अनुसार, यह पूरी ज़मीन निजी स्वामित्व (privately owned) में है। इसके अधिग्रहण और संरक्षण के लिए लगभग 40 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जिसका प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है। भूमि अधिग्रहण, संरक्षण योजना और मौसम जैसी कई चुनौतियों को पार करने के बाद ही खुदाई का अगला अध्याय शुरू हो पाएगा।

SUMMARY 
उज्जैन के पास स्थित Vaishya Tekri archaeological site भारत के इतिहास का एक अनछुआ अध्याय है, जो ancient Buddhist heritage of Ujjain को नई पहचान दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि Vaishya Tekri biggest Buddhist stupa in India comparison में सांची के स्तूप को भी पीछे छोड़ सकता है, जिसका संबंध सीधे मौर्य काल के Emperor Ashoka and Queen Devi history से है। Vaishya Tekri excavation updates के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार और ASI इस 2000 years old hidden stupa near Ujjain के रहस्यों को उजागर करने के लिए प्रयासरत हैं। यदि 1939 की अधूरी खुदाई को फिर से शुरू किया जाता है, तो यह स्थल Madhya Pradesh tourism and history के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।

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