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अपराधी को सजा दिलाने कोर्ट में कितने गवाह जरूरी, यहां पढ़िए Law of Evidence

बहुत लोगों के मन में एक प्रश्न होता है कि अगर कोई अपराध हुआ है तो उसे प्रमाणित करने के लिए कितने गवाह होना चाहिए, ऐसा होता है कि बहुत से शिकायतकर्ता बहुत सारे गवाहों के नाम लिखवा देते है या कोई बलशाली व्यक्ति के खिलाफ गवाही नहीं देता है, क्या विधि में अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए बहुत साक्षियों की आवश्यकता होती है या बलशाली व्यक्ति के खिलाफ कोई गवाही न दे तो वह अपराध से बच जाता है। आज हम आपको बहुत महत्वपूर्ण जानकारी देंगे। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872 की धारा 134 की परिभाषा:-

साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 के अनुसार किसी भी मामले वास्तविकता को साबित करने के लिए साक्षियों की किसी विशेष संख्या की अपेक्षा नहीं होगी, यह पूर्ण रूप से न्यायालय के विवेक पर छोड़ दिया गया है, किसी भी तथ्य को साबित करने के लिए एक से अधिक साक्षियों की आवश्यकता नहीं होती हैं क्योंकि एक साक्षी का गुण ओर सत्यता मान्य होती हैं। साक्षियों की संख्या कोई महत्व नहीं रखती है। न्यायालय साक्ष्य का भार देखता है न कि उसे गिनता है। अतः कहा जा सकता है कि किसी एक प्रत्यक्षदर्शी का सत्य, स्थिर और विश्वास जगाने वाला साक्ष्य ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होता है।

इसी बात को न्यायमूर्ति रोहतगी जी ने कहा है:- कोई ऐसा तकनीक नियम नहीं है, न्यायाधीश भी कम्प्यूटर नहीं होते। सारी बात परिस्थितियों तथा केवल एकमात्र गवाह की बात की सत्यता पर निर्भर होती है।

जब कोई गवाही न दे तब गवाह कौन होता है:-

परीक्षण-न्यायालय ने आरोपी को उस स्थान का खतरनाक बदमाश बताया है, कोई भी उसके खिलाफ गवाही देने को तैयार नहीं था। ऐसी परिस्थिति में न्यायालय को ही हकीकत निकालनी एवं जाननी बढ़ती है।

उधरणानुसार वाद:- मुंशी प्रसाद बनाम स्टेट ऑफ बिहार:- पड़ोस की बस्ती के लोगों में से किसी भी स्वतंत्र गवाह को पेश न करना, इसे कोइ महत्व नहीं diya गया क्योंकि जो सबूत न्यायालय में पेश किये गए थे वह अपराधी को दोषसिद्धि करने के लिए पर्याप्त थे। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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