राजगढ़ : कानून, संस्कार और सियासत | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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राजगढ़ : कानून, संस्कार और सियासत | EDITORIAL by Rakesh Dubey

समाज कहाँ जा रहा है ? आज देश का समाज हिस्सों में विभक्त दिखाई दे रहा है। पहला हिस्सा वो है जो सरकार के साथ है, दूसरा हिस्सा वो है जो सरकार के साथ नहीं है, तीसरा और बड़ा हिस्सा वो है जिसकी रोजी-रोटी इस संकट में फंसती दिखाई दे रही है और चौथा हिस्सा वो नौकरशाही है जो विवेक की जगह खुशमद से नौकरी कर रही हैऔर पांचवा और सबसे छोटा हिसा नेताओं का है जो पूरे समाज को भरमा रहा हे। राजगढ़ की घटना इस बात का पर्याप्त उदाहरण है |पूरा देश नागरिकता कानून को लेकर हिस्सों में बंट गया है | कहीं धारा १४४ नाम रस्म अदायगी की तरह  लागू है तो कहीं कर्फ्यू से बदतर। कुछ लोग केंद्र सरकार के साथ है तो कुछ लोग दूसरी पार्टी की राज्य सरकार के साथ। नौकरशाह भी इसी अनुपात में बंटे है अपने विवेक की जगह खुशामद का इस्तेमाल आवश्यकता के अनुरूप कर रहे हैं। हालत यही रही समाज का बड़ा हिस्सा जो शांति से दो जून की रोटी जुटा लेता है और मुश्किल में आ सकता है | मूल मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार जो समझा रही है या समझाना चाहती है उसे नागरिक समझने की कोशिश करे इससे पहले उस पर सियासत हो रही है। समझ नही आ रहा ये क्या है ? समाज बंटता साफ दिख रहा है और बंटवारा क्या क्या खायेगा इसकी चिंता किसी को नहीं है।

मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन में प्रदर्शन और इस दौरान राजगढ़ की महिला कलेक्टर निधि निवेदिता एवं उनके अधीनस्थ काम कर रहीं डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा द्वारा की गई हाथापाई को लेकर मध्यप्रदेश में सियासत हो रही है। जो धारा 144 भोपाल में धरना और  प्रदर्शन से आँख मूंद रही है वो राजगढ़ में युद्ध का मैदान बन जाती है। भोपाल में धरना केंद्र के खिलाफ था तो राजगढ़ में केंद्र के समर्थन में। अधिकारियों के विवेक, कानून में अधिकार, नागरिक समझ, भारत के संस्कार, आत्म रक्षा के सिद्धांत से पहले धारा 144

सिटीजनशिप अमेंडमेंट ऐक्ट यानी सीएए को लेकर देश में काफी दिनों से प्रदर्शन चल रहे हैं। कई जगहों पर इन प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक प्रदर्शनों में बदलने से रोकने के लिए कई राज्यों में धारा १४४  लगा दी गई है।  दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १४४ शांति कायम करने के लिए उस स्थिति में लगाई जाती है जब किसी तरह के सुरक्षा संबंधित खतरे या दंगे की आशंका हो। धारा-१४४  जहां लगती है, उस इलाके में पांच या उससे ज्यादा आदमी एक साथ जमा नहीं हो सकते हैं। धारा लागू करने के लिए इलाके के जिलाधिकारी द्वारा एक नोटिफिकेशन जारी किया जाता है। यह धारा लागू होने के बाद उस इलाके में हथियारों के ले जाने पर भी पाबंदी होती है।इसमें अब एक नया काम इंटरनेट सेवाओं को भी आम पहुंच से ठप किया जाने  लगा है।धारा-१४४  को २  महीने से ज्यादा समय तक नहीं लगाया जा सकता है। अगर राज्य सरकार को लगता है कि इंसानी जीवन को खतरा टालने या फिर किसी दंगे को टालने के लिए इसकी जरूरत है तो इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इस स्थिति में भी धारा-१४४  लगने की शुरुआती तारीख से छह महीने से ज्यादा समय तक इसे नहीं लगाया जा सकता है|गैर कानूनी तरीके से जमा होने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दंगे में शामिल होने के लिए मामला दर्ज किया जा सकता है। इसके लिए अधिकतम तीन साल कैद की सजा हो सकती है।

अब इसका प्रयोग सरकारे अपने हिसाब से कर रही हैं, कहीं  धारा १४४ में ही धरने हो रहे है और कहीं उल्लंघन पर लाठी गोली | अवधि घटाने बढ़ाने के कारण न्यायोचित नहीं है राजनीति और खुशामद का पुट साफ़ नजर आ रहा है | राजगढ़ का मामला लें | किसी अधिकारी के साथ झूमाझटकी किस प्रकार का प्रदर्शन है ? खास तौर पर महिला आधिकारी बाल खींचना कौन सा संस्कार है ? क्या धारा १४४ दंडाधिकारी को यह अधिकार देती है कि वो पुलिस के स्थान पर बल प्रयोग करे, छंटे मारे ? क्या भारतीय संस्कृति पर गर्व करने वाली पार्टी में शालीनता समाप्त हो गई है ? क्या राजनीति विद्वेषवश इस मामले को महिला विरोधी बनाया जाने में कुछ बड़े नेता भूमिका नहीं निभा रहे हैं ? इन सवालों के जवाब अपने भीतर खोजिये | इन हरकतों से समाज की खाई चौड़ी होगी ,इतिहास से सबक लें।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क 9425022703
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