केरल: पैमाने बदलिए, प्रकृति का मिजाज़ ठीक नहीं है | EDITORIAL by Rakesh Dubey

19 August 2018

मालूम नहीं, केंद्र सरकार किस बात का इंतजार कर रही है। कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां केंद्र सरकार से केरल बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने की मांग कर रही हैं, देश-विदेश से मदद  के संदेशे आ रहे हैं, प्रधानमंत्री खुद दौरा कर  चुके हैं, फिर किस बात का इंतजार है ? केरल इस समय भयंकर बाढ़ से जूझ रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मृतकों की संख्या 357 हो चुकी है, 4 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गए हैं। 20 हज़ार करोड़ की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। सरकार के अनुषांगिक सन्गठन  गौ हत्या के परिणाम जैसे अनाप-शनाप तर्क दे रहे हैं। सरकार को उदार होना चाहिए | मध्यप्रदेश सरकार ने भी 10 करोड़ देने की घोषणा की है।

इस बात से इंकार नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल के लिए ५०० करोड़ रुपये की तत्काल मदद का ऐलान किया है। इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने १००  करोड़ की राशि घोषणा कर दी थी।“राष्ट्रीय- आपदा” घोषित होने पर मानदंड बदल जाते हैं | लाखों लोगों की ज़िंदगी, आजीविका और भविष्य दांव पर है।कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया है |

जब भी भयंकर प्राकृतिक आपदा आती है तो राज्य सरकारें और प्रतिपक्ष  उसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने की मांग करते आए हैं। उनके अनुसार अगर आपदा को 'राष्ट्रीय आपदा' घोषित किया जाता है, तो बचाव कार्यों के लिए सामान, पुनर्वास कार्यों का सारा खर्चा केंद्र सरकार उठाती है । पहले भी कुछ बड़ी आपदाओं को भी ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने की मांग उठी थी जैसे २०१५ में दक्षिण भारत में आई बाढ़ जिसमे ५००  लोगों की मौत और २०  हज़ार करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई थी। २०१४ में कश्मीर बाढ़ के दौरान २७७  लोगों की मौत हुई और 2२५००  गांव नष्ट हुए थे । २०१३ में उत्तराखंड में प्रलय में ५७४८  लोगों की मौत हुई और ४२००  गांव नष्ट हुए थे । २००८ की बिहार में ४३४  लोगों की मौत हुई और २३ लाख लोगों का जीवन प्रभावित हुआ। केंद्र सरकार ने  तब भी इन आपदाओं को 'गंभीर प्रकृति की आपदा ही माना था, ‘राष्ट्रीय आपदा’ नहीं। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट २००५  में एक प्राकृतिक आपदा को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने के लिए कोई प्रावधान नहीं है। गृह मंत्रालय की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का उच्चतम श्रेणी में  'गंभीर प्रकृति की आपदा' है। प्रकृति के प्रकोप का कोई भरोसा नहीं है। हमें अपने नियम बदलने होंगे। राज्य का पहला दायित्व लोक कल्याण और लोक संरक्षण हैं। 

PunjabKesari २४ जुलाई २०१८ को केंद्रीय गृह राजयमंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में बताया कि अगर किसी राज्य में प्राकृतिक आपदा आती है तो आपदा प्रबंधन की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकारों की बनती है। ज़रुरत पड़ने पर  राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि (एनडीआरएफ) से अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है। उनका तर्क सही है, वर्तमान समय में प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखा रही है। हमें मदद के हाथ बड़े करना चाहिए।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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