फरार घोषित आरोपी को अग्रिम जमानत मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, legal advice

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 13 फरवरी 2026
: उच्चतम न्यायालय ने बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक कानून से भागने वाले और फरार घोषित अपराधी अग्रिम जमानत के पात्र नहीं हैं। न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक ऐसे आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई थी जो छह साल से अधिक समय से फरार था।

घटना का विवरण

यह कानूनी विवाद 2 जून 2017 को हुई एक हिंसक घटना से शुरू हुआ था, जो दो समूहों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम थी। इस घटना के दौरान गोलीबारी और पथराव हुआ, जिसमें बबलू चौधरी नामक व्यक्ति की मौत हो गई और शैलेंद्र उर्फ पिंटू गंभीर रूप से घायल हो गया था। इसके बाद आरोपी बालमुकुंद सिंह गौतम के खिलाफ Betma और Pithampur पुलिस थानों में हत्या (IPC धारा 302), हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पुलिस ने दो बार इनाम घोषित किया

न्यायालय के दस्तावेजों के अनुसार, बालमुकुंद सिंह गौतम घटना की तारीख (02.06.2017) से ही फरार (absconding) था। पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी के लिए 10,000 से 15,000 रुपये तक के इनाम की घोषणा की थी, लेकिन वह साढ़े छह साल तक पुलिस की पकड़ में नहीं आया। इस दौरान, उस पर मुख्य गवाह शैलेंद्र को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगा, ताकि वह जमानत का विरोध न करे। आरोपी के खिलाफ पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज थे। 

हाई कोर्ट का अपना लॉजिक था

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस आधार पर आरोपी को अग्रिम जमानत की राहत दी थी कि मामले के अन्य सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषमुक्त (acquitted) कर दिया गया था। उच्च न्यायालय का मानना था कि चूंकि मुख्य ट्रायल में अभियोजन पक्ष सबूत पेश करने में विफल रहा, इसलिए आरोपी को भी समानता (parity) के आधार पर राहत मिलनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के तर्क को विकृत और गलत बताया

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने उच्च न्यायालय के तर्क को "विकृत और गलत" करार दिया। न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:
  • न्यायालय ने दोहराया कि एक फरार अपराधी सामान्य नियम के तौर पर अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है, क्योंकि उसका आचरण न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाने जैसा है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपियों की दोषमुक्ति का लाभ उस व्यक्ति को नहीं मिल सकता जो ट्रायल से भागता रहा हो,। फरार आरोपी के खिलाफ सबूतों की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसे अपराधियों को राहत देना उन लोगों के लिए गलत संदेश है जो कानून का पालन करते हैं और ट्रायल का सामना करते हैं।

अंतिम निर्देश उच्चतम न्यायालय ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आत्मसमर्पण के बाद आरोपी नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन कर सकता है, जिस पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।
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