तोगड़िया प्रकरण ये सन्नाटा और ये सवाल | EDITORIAL

18 January 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। प्रवीण तोगड़िया के मामले को लेकर बनी सनसनीखेज खबर एकाएक गायब हो गई है। इससे 2 संकेत मिलते है पहला BJP की हिन्दू नीति (HINDU POLICY) में कोई परिवर्तन आ रहा है या राजनीतिक क्षेत्र में कोई आरोप प्रत्यारोप का नया सिलसिला आरम्भ हो रहा है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकारी अध्यक्ष PRAVEEN TOGADIA बीते दिन जब मीडिया के सामने आए तो रोते हुए बताया कि वे पुलिस से बचने के लिए गायब हो गए थे। उनका कहना है कि पुलिस उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार देना चाहती है। यह सही है कि राजस्थान पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई थी। वहां की एक कोर्ट ने एक पुराने मामले में उनके खिलाफ गैरजमानती वॉरंट निकाला था। 

इसके कुछ ही दिन पहले अहमदाबाद की एक कोर्ट ने भी तोगड़िया के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट निकाला था। सवाल यह है की वे न्यायालय से क्यों बचना चाह रहे हैं ? गुजरात और राजस्थान, दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है। ऐसे में हिंदुत्व के इस बड़े नेता के फेक एनकाउंटर का आरोप कितना सही है, इसका पता किसी विश्वसनीय जांच से ही चल सकता है। लेकिन तोगड़िया का इतना बड़ा आरोप लगाना अपने आप में कोई मामूली बात नहीं। इस सब के बावजूद भाजपा की चुप्पी इसे और रहस्यमय बना रही है।

'फेक एनकाउंटर' शब्द भारतीय समाज में व्याप्त होता जा रहा है। अदने से पुलिस कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक इसे एक बड़ा बहादुरी का कर्तव्य मानने लगे हैं। साथ ही देश की  आबादी का एक हिस्सा ऐसा मानने लगा है कि बड़े अपराधियों को सीधे, यानी केस-मुकदमे में पड़े बगैर ही मार गिराना अच्छी बात है। सख्त प्रशासक की छवि बनाने के इच्छुक कई नेता फर्जी मुठभेड़ों की वकालत करते हुए या इनका बचाव करते हुए नजर आने लगे हैं, गुजरात की पहली सरकार और हरियाणा की वर्तमान सरकार में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। 

किसी मामले में सत्तारूढ़ दल के किसी नेता के फंसने के आसार बने तो जरूर उसकी कुछ खोजबीन होती है, मगर ऐसे ज्यादातर मामले दो-चार दिन की चर्चा के बाद अपनी मौत मर जाते हैं। यह स्थिति चिंताजनक इसलिए है कि आम लोग यह देख ही नहीं पाते कि कैसे यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे कानून के शासन की मान्यता को ही अप्रासंगिक बना सकती है। आम लोग कुछ भी सोचें, इन नियोजित हत्याओं से जुड़े अधिकारियों को मालूम होता है कि उनका कृत्य कानून की नजरों में अपराध है। लिहाजा वे कई बार ऐसी एक घटना को छुपाने के लिए इस तरह की कई सारी घटनाएं कर डालते हैं। समय रहते यह समझ लेना जरूरी है कि अपराध पर काबू पाने के लिए अपराधियों को मौत के घाट उतारना अंतत: अपराध को सांस्थानिक रूप देना ही है। इसके बजाय उनके मन में यह डर बिठाना अधिक उपयोगी है कि वे आसानी से अपराध नहीं कर सकते, और कर भी दें तो कानून के हाथ उनके गिरेबान तक पहुंचे की उससे पहले मौत सजा  मिल जाये। प्रवीण तोगड़िया का मामला ऐसा नहीं है।

यह मामला सत्ता के केंद्र से ज्यादा अपेक्षा और फिर भीषण उपेक्षा का मालूम होता है। संघ के अनुषांगिक संगठनो की भाजपा सरकार में पूछ-परख बनी रहे इसका प्रयास ये सन्गठन हमेशा करते रहे हैं और देश में चुनावी राजनीति का जो माडल है,ऐसी अपेक्षा स्वभाविक रूप से जगा देता  है। इस अपेक्षा का पहला कदम न्यायालय की उपेक्षा होता है। जिसमें हर नेता अपने को और अपने समर्थकों को न्यायालय से उपर मानने लगता है। यह प्रवृत्ति घातक है और प्रजातंत्र में इसकी कोई जगह नहीं होना चाहिए।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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