“मोबाईल नम्बर” को “आधार” से जोड़ना

Updesh Awasthee
राकेश दुबे@प्रतिदिन। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताज़ा निर्णय में देश में काम कर रहे सभी मोबाइल नंबरों को एक साल के अंदर आधार नंबर से जोड़ने का निर्देश दिया है। अदालत ने सरकार से कहा है कि यह काम किसी भी हालत में एक साल के अंदर हो जाना चाहिए। अदालत का मानना है कि देश में सौ करोड़ से ज्यादा मोबाइल धारक हैं और इन सबको आधार से जोड़ने के लिए एक ऐसी व्यवस्था जरूरी है कि प्रीपेड उपभोक्ता भी अगली बार रिचार्ज कराने से पहले एक फॉर्म भरकर अपने ब्योरे जरूर दें। एक ऐसी नीति भी बनाने को कहा है, जो सख्त नियम-कानून के साथ सिम कार्ड के नाजायज इस्तेमाल को रोकने में कारगर साबित हो।

एक-एक मोबाइल नंबर का वेरीफिकेशन इसलिए भी जरूरी हो गया है कि अब यह सिर्फ बात करने का नहीं, बल्कि बैंकिंग का जरिया भी हो चुका है। मोबाइल धारकों का वेरीफिकेशन आधार नंबर से जोड़ने की बाध्यता की मांग टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी ट्राई ने की थी। ट्राई का मानना था कि आधार आधारित वेरीफिकेशन बेहतर होगा, क्योंकि यह ज्यादा तार्किक है और किसी व्यक्ति की बायोमीट्रिक डिटेल पर आधारित है। ऐसा हो जाने से किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश कम हो जाएगी। मोबाइल धारकों के वेरीफिकेशन की वर्तमान व्यवस्था को बहुत तार्किक तो नहीं ही कहा जा सकता। तमाम उदाहरण हैं, जब मामूली और कथित सत्यापन के आधार पर सिम जारी हुए और बाद में वेरीफिकेशन के नाम पर उपभोक्ता से रटे-रटाए जवाब दिलवा दिए गए।

अदालत का आदेश और ट्राई की मांग अभी दोनों बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह एक बहस तो है ही कि एक से ज्यादा सिम इस्तेमाल करने वाले के लिए भी क्या कोई नई गाइडलाइन होंगी या कि इसे कुछ नंबरों तक ही सीमित रखना होगा? यह भी कि क्या किसी एक नाम पर जारी सिम उसका कोई रिश्तेदार या घर का दूसरा सदस्य इस्तेमाल करता है या करना चाहता है, तो उसके लिए क्या व्यवस्था होगी? दरअसल, मांग तो काफी पहले आ गई थी, लेकिन एक बहस भी साथ ही शुरू हो गई थी कि आधार आधारित वेरीफिकेशन को बाध्यकारी कैसे बनाया जा सकता? इसमें तमाम दिक्कतें गिनाई जा रही थीं। 

ऐसे देश में, जहां कई बार जिसके नाम से सिम जारी हो जाए, उसी को पता न चले, वहां सख्त नियम-कानून जरूरी थे। शायद यह अकेला ऐसा तरीका हो, जो मोबाइल फोन के बेजा इस्तेमाल पर कारगर रोक लगाने में सफल हो। अब यह नई सूचना नहीं रह गई है कि पुलिस के पास ऐसे हजारों, बल्कि लाखों मामले लंबित हैं, जहां फर्जी नाम-पते पर जारी हुए सिम के कारण अभियुक्त तक पहुंचना खासा मुश्किल हो गया। लेकिन क्या नई व्यवस्था को भी अंतिम और फुलप्रूफ मान लिया जाए? ऐसे देश में, जहां ब्योरा बदलकर नया ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य कोई वांछित चीज हासिल की जा सकती हो, वहां ऐसे प्रयोग कितने और कब तक सार्थक हो पाएंगे, इस पर संदेह उठना गलत न होगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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