भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी अथवा हरछठ मनाई जाएगी। हरछठ व्रत (हल षष्ठी) सनातन धर्म में माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठिन और फलदायी व्रत है। यह पर्व भाद्रपद (भादो) मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में प्रसिद्ध है:
हरछठ व्रत के कड़े नियम (विशेष बातें)
इस व्रत की शुद्धता और नियम अन्य व्रतों से काफी अलग होते हैं:
हल से जुता अनाज वर्जित: इस दिन हल से जोतकर उगाए गए किसी भी अनाज (जैसे गेहूं, चावल, दाल) का सेवन नहीं किया जाता पसाही/तिन्नी के चावल भोजन में केवल तालाब या बिना हल जोते उगने वाले पसाही (तिन्नी) के चावल और महुआ का ही प्रयोग होता है।
सिर्फ भैंस के दूध का प्रयोग: इस व्रत में गाय के दूध, दही या घी का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग पूजा और पारण में किया जाता है।
पूजन का शुभ मुहूर्त:
षष्ठी तिथि प्रारंभ: 2 सितंबर 2026 को सुबह 06:12 - 06:13 बजे से
समाप्त: 3 सितंबर 2026 को सुबह 04:26 बजे (ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व) तक
(नोट: 2 सितंबर को सूर्योदय के समय सुबह 06:12/06:13 बजे तक पंचमी तिथि रहेगी, जिसके तुरंत बाद पूरे दिन और रात भर षष्ठी तिथि प्रभावी रहेगी।)
पूजन का उचित एवं शुभ मुहूर्त
पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए दिन के चौघड़िया एवं शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
प्रातः काल / अमृत चौघड़िया (अति उत्तम): सुबह 09:10 बजे से सुबह 10:45 बजे तक।
2 सितंबर 2026 को अभिजीत मुहूर्त के दौरान(दोपहर 12:20 से 1:55) राहु काल होने के कारण उस समय नए व्रत के संकल्प के लिए उचित मुहूर्त नहीं रहेगा राहुकाल व्यतीत हो जाने के पश्चात ही संकल्प पूजन कार्य आदि प्रारंभ करना ठीक रहेगा।
सायंकाल पूजन मुहूर्त (संध्या पूजा के लिए): रात 08:00 बजे से रात 09:30 बजे तक (लाभ/शुभ चौघड़िया)
आवश्यक पूजन सामग्री:
कुश (घास), महुआ की टहनी/फल, पलाश और झरबेरी (कांटेदार झाड़ी) की पत्तियां तिन्नी (पसाही) का चावल, महुआ, सात प्रकार के भुने हुए अनाज (चना, जौ, गेहूं, धान, मक्का, अरहर, मूंग) अन्य सामग्री: भैंस का दूध, दही और घी, मिट्टी के कुल्हड़ (कुलिया), नए वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, रोली, चंदन, अक्षत, धूप और भैंस के घी का दीपक।
संपूर्ण पूजन विधि :
व्रत के दिन सुबह महुआ की दातुन से दांत साफ कर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। घर के आंगन या किसी पवित्र स्थान को साफ करके वहां गोबर से लीप लें। वहां मिट्टी और कुश की मदद से एक छोटा कृत्रिम तालाब या गड्ढा बनाया जाता है जिसे 'हरछठ' कहा जाता है इस तालाब में झरबेरी, पलाश और कुश की टहनियों को एक साथ बांधकर गाड़ दिया जाता है।
जल, रोली, सिंदूर और अक्षत से हरछठ माता और भगवान बलराम का पूजन करें।भैंस के घी का दीपक जलाएं।जितने पुत्र हों, उतने मिट्टी के कुल्हड़ों (कुलिया) में भुना हुआ सात प्रकार का अनाज और महुआ भरकर माता के पास समर्पित करें हाथ में तिन्नी के चावल और महुआ के फूल लेकर हरछठ माता की छह कहानियां सुनी जाती हैं।
दोपहर या शाम को पूजा के बाद भैंस के दूध-दही और तिन्नी के चावल का सेवन करके ही व्रत खोला जाता है।
हरछठ व्रत की कथा (राजा, बहू और तालाब की कहानी)
प्राचीन काल में चंद्रव्रत नाम के एक प्रतापी राजा थे। राजा ने अपनी प्रजा के कल्याण और पानी की समस्या दूर करने के लिए नगर के पास एक बहुत बड़ा तालाब (सगरा) खुदवाया। लेकिन विडंबना यह थी कि उस तालाब में पानी की एक बूंद भी नहीं रुकती थी। राजा ने कितना भी प्रयास किया, पानी तुरंत सूख जाता था।
राजा अत्यंत चिंतित रहने लगे। तब उन्होंने राज्य के बड़े पंडितों और ज्योतिषियों को बुलाकर इसका उपाय पूछा। ज्योतिषियों ने गणना करके बताया, "हे राजन! यदि आप इस तालाब में अपने इकलौते पोते (यानी अपने बड़े पुत्र के बेटे) की बलि देंगे, तभी इस तालाब में पानी रुकेगा और प्रजा का कल्याण होगा।"
प्रजा के हित और राजधर्म के आगे राजा विवश हो गए। उन्होंने अपनी बड़ी बहू (पोते की मां) को धोखे से उसके मायके भेज दिया। बहू के जाने के बाद राजा और सास ने चुपके से उस छोटे बालक को तालाब के बीच ले जाकर उसकी बलि दे दी। बलि देते ही चमत्कार हुआ; पूरा तालाब लबालब पानी से भर गया, कमल के फूल खिल उठे और लहरें उठने लगीं।
उधर रास्ते में बहू को कुछ राहगीर मिले, जिन्होंने उसे बातों-बातों में बताया, "तुम्हारे ससुर ने जो बड़ा तालाब बनवाया था, उसमें पानी लाने के लिए तुम्हारे पुत्र की बलि दे दी गई है!" यह सुनते ही बहू के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह रोती-बिलखती हुई वापस ससुराल की ओर दौड़ी।
उस दिन भाद्रपद मास की हरछठ (हल षष्ठी) तिथि थी। बहू ने रास्ते में ही रोते हुए सच्चे मन से हरछठ माता का ध्यान किया और अपनी गोदी फिर से हरी करने की मन्नत मांगी।
जब वह हांफती हुई उस तालाब के पास पहुंची, तो उसने देखा कि तालाब पानी से भरा हुआ है और पानी के बीचों-बीच पुरइन (कमल) के पत्तों के पास उसका बेटा जीवित खड़ा होकर खेल रहा है। वह खुशी से रो पड़ी और दौड़कर अपने बेटे को गले से लगा लिया।
जब वह बच्चे को लेकर महल पहुंची, तो राजा और सास हैरान रह गए। बहू ने कहा, "आज आपने प्रजा के लिए मेरे बेटे की बलि दे दी थी, लेकिन मेरे सत और हरछठ माता की असीम अनुकंपा से मेरा बेटा दोबारा जीवित हो गया।" राजा और पूरी प्रजा ने हरछठ माता की जय-जयकार की और तभी से यह व्रत संतान की लंबी उम्र और रक्षा के अचूक उपाय के रूप में लोक में प्रसिद्ध हो गया।
हरछठ व्रत के दौरान माताएं अपने पुत्रों की संख्या के बराबर 'कुलिया' (मिट्टी के कुल्हड़) भरती हैं।
राजा सुबाहु और रानी सुवर्णा की कथा:
राजा सुबाहु की रानी का नाम सुवर्णा था। उनका एक अत्यंत सुंदर पुत्र हुआ।एक दिन धाय (सेविका) बालक को गंगाजी के तट पर खेला रही थी, तभी बालक उसके हाथ से छूटकर जल में गिर गया और एक मगरमच्छ उसे निगल गया। धाय डर के मारे चुपचाप लौट आई और उसने रानी से झूठ कह दिया कि बालक को किसी ने चुरा लिया है या वह कहीं खो गया है। पुत्र वियोग में रानी सुवर्णा अत्यंत व्याकुल होकर जंगल में चली गईं। वहां वे शिव-पार्वती और गणेश जी की पूजा करने लगीं तथा कुश और पलाश के वृक्षों के नीचे बैठकर निरंतर रोने और विलाप करने लगीं।
दुर्वासा ऋषि का आगमन और व्रत का उपदेश: उसी समय वहां दुर्वासा ऋषि आए। रानी की व्यथा सुनकर ऋषि ने उन्हें भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी (हलषष्ठी/हरछठ) का व्रत करने का विधान बताया, जिसमें कुश और पलाश के नीचे शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय जी की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है।दुर्वासा ऋषि के उपदेशानुसार जब राजा और रानी ने इस व्रत का नियमपूर्वक पालन किया, तो भगवान की कृपा से मगरमच्छ के बिल/पेट से वह राजकुमार जीवित और पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकल आया। बालक दौड़कर अपने माता-पिता और दुर्वासा ऋषि के चरणों में गिर पड़ा। इस प्रकार हलषष्ठी व्रत के प्रभाव से रानी सुवर्णा को उनका खोया हुआ पुत्र पुनः जीवित अवस्था में प्राप्त हो गया।
महाभारत के युद्ध के बाद, द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट करने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था।
इसके कारण उत्तरा का गर्भस्थ शिशु मृतप्राय हो गया था।
इस पर भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा को हल षष्ठी (हरछठ) व्रत करने की सलाह दी।
उत्तरा ने पूरी श्रद्धा के साथ यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनका मृत पुत्र पुनः जीवित हो गया और स्वस्थ होकर जन्मा। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, समृद्धि और संकटों से रक्षा के लिए करती हैं।
छठ माता का चित्र
हलषष्ठी हरछठ की व्रतकथा: ग्वालिन
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा।
यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।
वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हलषष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया।
उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।
इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।
कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है।
वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए।
ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।
बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।



