366 सीटें खाली होने के बावजूद नहीं मिली पसंदीदा सीट, रेलवे की बर्थ आवंटन प्रणाली पर उठे सवाल

Updesh Awasthee
भोपाल, 10 जून 2026
: भारतीय रेलवे की ऑनलाइन टिकट बुकिंग व्यवस्था और बर्थ आवंटन प्रणाली को लेकर एक यात्री ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कानपुर से भोपाल जाने के लिए ग़रीब रथ एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12593) में टिकट बुक कराने वाले यात्री का आरोप है कि शिशु (इन्फैंट) के साथ यात्रा करने के बावजूद उसे पसंदीदा साइड लोअर बर्थ नहीं दी गई, जबकि बुकिंग के समय ट्रेन में बड़ी संख्या में सीटें उपलब्ध थीं।

यात्री के अनुसार, वह अपनी पत्नी और शिशु के साथ यात्रा कर रहा था। शिशु के साथ सफर को सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने के लिए उसने टिकट बुकिंग के दौरान विशेष रूप से साइड लोअर बर्थ को अपनी प्राथमिकता (Preference) के रूप में चुना था। इसके बावजूद रेलवे ने उसे मिडिल बर्थ आवंटित कर दी।

यात्री का कहना है कि टिकट बुकिंग के समय ग़रीब रथ एक्सप्रेस में लगभग 366 सीटें उपलब्ध दिखाई दे रही थीं। ऐसे में उसका मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में सीटें खाली होने पर कम से कम कुछ साइड लोअर बर्थ अवश्य उपलब्ध रही होंगी। इसके बावजूद उसे मिडिल बर्थ आवंटित किया जाना समझ से परे है।

यात्री ने बताया कि इससे पहले भोपाल से कानपुर की यात्रा के लिए जब केवल दो वयस्कों के नाम पर टिकट बुक की गई थी, तब रेलवे ने उसकी पसंद के अनुरूप सीट आवंटित कर दी थी। लेकिन वापसी यात्रा में जैसे ही शिशु का विवरण जोड़ा गया, उसे साइड लोअर के बजाय मिडिल बर्थ दे दी गई।

यात्री को लगा कि संभवतः कोई तकनीकी त्रुटि हुई होगी। इसलिए उसने पहली टिकट रद्द कर दी और दोबारा टिकट बुक की। दूसरी बार भी उसने सावधानीपूर्वक साइड लोअर बर्थ को प्राथमिकता में चुना, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसे फिर वही कोच नंबर (G9) और वही मिडिल बर्थ आवंटित कर दी गई।

यात्री ने प्रश्न उठाया है कि यदि बुकिंग के समय 366 सीटें उपलब्ध थीं और उसने दो बार स्पष्ट रूप से साइड लोअर बर्थ की मांग की थी, तो उसे वही मिडिल बर्थ दोबारा कैसे आवंटित कर दी गई? उसका कहना है कि रेलवे को बर्थ आवंटन प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए ताकि यात्रियों को यह पता चल सके कि उनकी पसंदीदा बर्थ क्यों नहीं दी गई।

दो मिनट में 220 रुपये कटे

यात्री ने रेलवे की टिकट रद्दीकरण नीति पर भी नाराजगी व्यक्त की है। उसका कहना है कि पहली टिकट रद्द करने पर लगभग 190 रुपये काट लिए गए, जबकि टिकट बुकिंग के समय लगभग 30 रुपये का सुविधा शुल्क (Convenience Fee) पहले ही लिया जा चुका था।

यात्री का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति केवल अपनी आवश्यकतानुसार उपयुक्त सीट प्राप्त करने के लिए टिकट रद्द कर पुनः बुकिंग करता है, तो उस पर इतना अधिक आर्थिक दंड लगाना उचित नहीं प्रतीत होता। उसका सवाल है कि कुछ ही मिनटों में टिकट रद्द करने पर रेलवे को ऐसा कौन-सा अतिरिक्त नुकसान हो जाता है, जिसके लिए इतनी बड़ी राशि काट ली जाती है।

'स्पेशल ट्रेन' के नाम पर अधिक किराया वसूलने का आरोप

यात्री ने रेलवे द्वारा संचालित तथाकथित "स्पेशल ट्रेनों" के किराये पर भी सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार से दक्षिण भारत तथा अन्य राज्यों के लिए बड़ी संख्या ( 04226, 01080, 04212, 09206, 09190, 01416,  01080 Etc) में स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, लेकिन  उनमें कोई विशेष सुविधा दिखाई नहीं देती।

यात्री के अनुसार, नियमित ट्रेनों और स्पेशल ट्रेनों के किराये की तुलना करने पर उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, कानपुर से भोपाल के बीच एक नियमित ट्रेन 12184 में स्लीपर, थर्ड एसी और सेकेंड एसी का किराया क्रमशः लगभग 360 रुपये, 415 रुपये और 1270 रुपये है, जबकि स्पेशल ट्रेन संख्या 09190 में यही किराया क्रमशः 425 रुपये, 1140 रुपये और 1595 रुपये तक पहुंच जाता है।

उसका आरोप है कि कई स्पेशल ट्रेनों में वही पुराने कोच, वही सीटें और वही सामान्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन "स्पेशल" नाम जोड़कर यात्रियों से अधिक किराया वसूला जाता है।

यात्री ने रेलवे मंत्रालय से मांग की है कि शिशु के साथ यात्रा करने वाले परिवारों को बर्थ आवंटन में प्राथमिकता दी जाए, बर्थ आवंटन प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए तथा स्पेशल ट्रेनों के किराया निर्धारण की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।
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