घर के भीतर जातिगत टिप्पणी SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं: उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 11 मई 2026
: उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत कोई अपराध तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक कि कथित अपमानजनक घटना "सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान" (In any place within public view) पर न हुई हो। न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस मामले में अपीलकर्ताओं के खिलाफ तय किए गए आरोपों को खारिज कर दिया।

SC/ST Act Not Applicable for Caste Comment Made Within Private Home, Rules Supreme Court

यह कानूनी विवाद एक ही परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति विवाद से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 28 जनवरी 2021 को अपीलकर्ताओं ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और अपीलकर्ता नंबर 1 (गुंजन) ने उनके और उनकी पत्नी के खिलाफ जातिगत अपशब्दों का प्रयोग किया। दिल्ली के रमेश नगर स्थित एक निजी आवासीय घर में यह घटना तब हुई जब आरोपी घर का ताला तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन आरोपों को बरकरार रखा था, जिसे अब उच्चतम न्यायालय ने पलट दिया है।

Legal Aspect: The Doctrine of 'Public View'

अदालत ने इस मामले में SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) की व्याख्या की। इन धाराओं के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य शर्तें (Ingredients) हैं:
आरोपी व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य न हो।
उसने जानबूझकर अपमान या डराने-धमकाने का कार्य किया हो।
सबसे महत्वपूर्ण: यह कृत्य "सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान" पर किया गया हो।

सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: सार्वजनिक स्थान बनाम सार्वजनिक दृष्टि (Public Place vs. Public View): 

सार्वजनिक स्थान का मतलब होता है ऐसा स्थान जहां कोई भी उपस्थित हो सकता है। किसी के आने जाने पर कोई रोक-टोक नहीं होती। जबकि सार्वजनिक दृष्टि, इससे अलग है। न्यायालय ने 'स्वर्ण सिंह बनाम राज्य' मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक निजी स्थान (जैसे घर का लॉन) भी "सार्वजनिक दृष्टि" में हो सकता है यदि उसे बाहर सड़क से देखा जा सके। लेकिन यदि घटना चारदीवारी के भीतर होती है जहाँ जनता मौजूद नहीं है, तो वह "सार्वजनिक दृष्टि" की श्रेणी में नहीं आती।

वर्तमान मामले में स्थिति: चूंकि यह घटना एक बंद निजी घर के अंदर हुई थी और वहां कोई बाहरी व्यक्ति या "सार्वजनिक आंख" (Public Eye) मौजूद नहीं थी, इसलिए SC/ST एक्ट की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं हुई।

आपराधिक धमकी (धारा 506 IPC) पर निर्णय

अपीलकर्ताओं पर आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत भी आरोप लगाए गए थे। न्यायालय ने इसे भी खारिज करते हुए कहा कि केवल धमकी देना पर्याप्त नहीं है; इसमें "भय पैदा करने का इरादा" (Intent to cause alarm) होना आवश्यक है, जो इस मामले में अनुपस्थित पाया गया। इसके अलावा, धारा 34 (समान मंशा) के तहत भी कोई ठोस सबूत नहीं मिले।

निष्कर्ष और संदेश

उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने कानून की गलत व्याख्या करते हुए आरोप तय किए थे। न्यायालय ने प्राथमिकी (FIR No. 42/2021) और चार्जशीट को रद्द करते हुए कहा कि कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर किसी को केवल अपमान के आधार पर परीक्षण (Trial) का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, यदि अपराध की मूल कानूनी शर्तें पूरी न होती हों। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (पत्रकार एवं विधि सलाहकार)।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!