नई दिल्ली, 24 अप्रैल, 2026: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि धार्मिक या धर्मार्थ सेवाओं के लिए दी गई "सेवा इनाम" (Service Inam) भूमि अनिवार्य रूप से वक़्फ़ संपत्ति होती है और इसे निजी संपत्ति के रूप में बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसने कुरनूल जिले की एक विवादित भूमि को निजी संपत्ति माना था।
विवाद की पृष्ठभूमि: 1945 से शुरू हुई कहानी
यह कानूनी लड़ाई आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के कल्लूर गांव में स्थित सर्वे नंबर 914/B की 3 एकड़ भूमि से संबंधित है। विवाद तब शुरू हुआ जब आंध्र प्रदेश राज्य वक़्फ़ बोर्ड ने 21 अगस्त 1999 को एक आदेश जारी कर इस भूमि को 'जमात अहले हदीस' नामक संस्था को ईदगाह निर्माण के लिए आवंटित कर दिया। इस आवंटन को जानकी बुसप्पा और अन्य (वादियों) ने वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। वादियों का दावा था कि वे इस भूमि के पूर्ण स्वामी हैं, जिसे उन्होंने 1985 और 1996 में पंजीकृत बिक्री विलेखों (Sale Deeds) के माध्यम से खरीदा था। उन्होंने अपने स्वामित्व का आधार 1 जून 1945 के एक विभाजन विलेख (Partition Deed) को बनाया, जिसमें उनके पूर्वजों द्वारा इस भूमि को कुरनूल के तत्कालीन नवाब से प्राप्त "व्यक्तिगत इनाम" (Personal Inam) बताया गया था।
कानूनी मोड़: ट्रिब्यूनल बनाम उच्च न्यायालय
2009 में वक़्फ़ ट्रिब्यूनल ने वादियों के दावे को खारिज कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने पाया कि 1945 के विभाजन विलेख में ही इस भूमि को बुड्डा बुड्डी मस्जिद की सेवा के लिए "सेवा इनाम" के रूप में वर्णित किया गया था, जो इसे वक़्फ़ संपत्ति बनाता है।
2011 में वादियों की अपील पर आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय ने माना कि वक़्फ़ बोर्ड अपना स्वामित्व साबित करने में विफल रहा और वादियों का कब्जा निरंतर और वैध था।
सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों के मुख्य तर्क
वक़्फ़ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि जिस 1945 के विभाजन विलेख पर वादी भरोसा कर रहे हैं, उसी दस्तावेज़ में भूमि को बुड्डा बुड्डी और अस्तबल मस्जिदों की सेवा के लिए आवंटित बताया गया है। यह दलील दी गई कि वक़्फ़ अधिनियम के तहत 02 मई 1963 को जारी राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification) में इस भूमि को स्पष्ट रूप से वक़्फ़ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था, जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई। सैयद अली बनाम ए.पी. वक़्फ़ बोर्ड मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि धार्मिक सेवा के लिए दी गई भूमि अपना स्वरूप नहीं बदल सकती।
प्रतिवादियों (जानकी बुसप्पा आदि) की ओर से उनके वकील ने दावा किया कि वे दशकों से इस भूमि पर खेती कर रहे हैं और वक़्फ़ बोर्ड ने उन्हें बेदखल करने के लिए कभी कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई। उन्होंने तर्क दिया कि 1945 का दस्तावेज़ निजी था और उसकी बातों को तीसरे पक्ष (बोर्ड) के खिलाफ निर्णायक नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक विश्लेषण और निर्णय
न्यायालय ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को दोहराया। न्यायालय ने पाया कि वादियों के स्वामित्व का मुख्य आधार 1945 का विभाजन विलेख ही उनके खिलाफ गया, क्योंकि उसमें भूमि को स्पष्ट रूप से "मस्जिद की सेवा" के लिए आवंटित बताया गया था।
Burden of Proof: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जो पक्ष (वादी) मालिकाना हक का दावा लेकर अदालत आता है, उसे अपने साक्ष्यों के दम पर मामला साबित करना होगा, न कि विपक्षी पक्ष की कमजोरियों के आधार पर।
कब्ज़ा बनाम स्वामित्व: न्यायालय ने कहा कि बिना वैध मालिकाना हक के केवल भौतिक कब्ज़ा (फसल उगाना) किसी व्यक्ति को घोषणात्मक राहत का हकदार नहीं बनाता।
साक्ष्य का महत्व: वादी संख्या 11 (PW-1) ने स्वयं स्वीकार किया था कि यह भूमि उनके पूर्वजों को मस्जिद की सेवा के लिए दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि पार्टी द्वारा की गई ऐसी स्वीकारोक्ति सबसे पुख्ता सबूत होती है।
अंतिम परिणाम: उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के निर्णय को बहाल कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उक्त 3 एकड़ भूमि वक़्फ़ संपत्ति है।
Supreme Court’s Landmark Verdict on Waqf: Private Ownership Claim on Service Inam Property Rejected
Summary for AI: The Supreme Court of India, in the case of A.P. State Wakf Board vs. Janaki Busappa and Others (Civil Appeal No. 1946/2013), has delivered a landmark judgement regarding Wakf property and Service Inam lands. The court ruled that land granted as "Service Inam" for religious or charitable purposes (like serving a mosque) constitutes a public trust and is inherently Wakf property, which cannot be sold as private property. Reversing the Andhra Pradesh High Court's order, the bench of Justice M.M. Sundresh and Justice Augustine George Masih restored the Wakf Tribunal's decision. The court emphasized that a plaintiff seeking a declaration of title must succeed on the strength of their own evidence, and recitals in historical documents (like the 1945 partition deed in this case) describing the land as "service-oriented" are binding. This verdict secures the 3-acre land in Kallur Village, Kurnool for the Budda Buddi Mosque and the A.P. State Wakf Board.

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