अनियमित कर्मचारियों को नियमित करने से बचने उमादेवी निर्णय का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2026:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनियमित कर्मचारियों के पक्ष में बाद ऐतिहासिक फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि, कैजुअल वर्करों (दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों) की सेवाओं को नियमित करने से बचने के लिए उमादेवी निर्णय का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया है जिसने इन कर्मचारियों की नियमितीकरण की मांग को खारिज कर दिया था।

Supreme Court Issues Key Clarification on Regularisation of Irregular Employees

यह मामला पवन कुमार और अन्य बनाम भारत संघ का है। याचिकाकर्ता ग्वालियर स्थित आयकर आयुक्त कार्यालय में लंबे समय से सफाई कर्मचारी और रसोइया जैसे पदों पर कैजुअल वर्कर के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने रोजगार कार्यालय (Employment Exchange) के माध्यम से पंजीकरण कराया था और साक्षात्कार के बाद उन्हें काम पर रखा गया था।

जब विभाग ने उनकी सेवाओं को नियमित करने के बजाय काम को आउटसोर्स करना शुरू किया, तो कर्मचारियों ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) और फिर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, दोनों जगहों से उन्हें यह कहकर राहत नहीं मिली कि वे 10 अप्रैल 2006 तक 10 साल की निरंतर सेवा की शर्त पूरी नहीं करते थे, जैसा कि 'उमादेवी मामले' के निर्णय में अनिवार्य था।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इन कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया:
समानता का अधिकार: न्यायालय ने पाया कि इसी तरह के अन्य दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों (जैसे 'रवि वर्मा' और 'रमन कुमार' मामले में) की सेवाओं को पहले ही नियमित किया जा चुका है। चूंकि वर्तमान याचिकाकर्ताओं के नाम भी उसी सूची में शामिल थे, इसलिए उन्हें समान लाभ मिलना चाहिए।
काम की प्रकृति: कोर्ट ने कहा कि जिस काम को बाद में आउटसोर्स किया गया, वह इस बात का सबूत है कि वह काम स्थायी प्रकृति (perennial nature) का था और विभाग को उन सेवाओं की निरंतर आवश्यकता थी।

'अनियमित' बनाम 'अवैध' नियुक्ति: 

'जग्गो बनाम भारत संघ' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों को "अवैध" नहीं बल्कि "अनियमित" माना जाना चाहिए, क्योंकि वे उचित प्रक्रिया (साक्षात्कार और रोजगार कार्यालय) के माध्यम से आए थे। प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं की कमी के आधार पर दशकों की सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि: याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को 1 जुलाई 2006 से नियमित माना जाए। नियमितीकरण से जुड़े सभी परिणामी लाभ (consequential benefits) कर्मचारियों को आज से तीन महीने के भीतर जारी किए जाएं।

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि 'उमादेवी निर्णय' का उद्देश्य उन कर्मचारियों को दंडित करना नहीं था जिन्होंने दशकों तक राज्य की आवश्यक सेवा की है, बल्कि इसका गलत इस्तेमाल अक्सर लंबी अवधि से काम कर रहे कर्मचारियों के जायज दावों को खारिज करने के लिए किया जाता है।
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