नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2026: रेजिडेंशियल सोसायटी और कॉलोनी में रहने वाले पड़ोसियों के बीच के विवाद, जो रात के डिनर तक सामान्य हो जाते थे और दोनों पक्ष सुबह की चाय एक साथ पीते हुए दिखाई देते थे। समाज का चित्र बदलने लगा है। कॉलोनी में स्कूटर की पार्किंग को लेकर एक विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। तनाव की स्थिति इतनी अधिक बढ़ गई कि जो लोग बीच बचाव करने आए थे, उनके खिलाफ भी मुकदमा कर दिया गया। पिछले 4 साल से कोर्ट कचहरी हो रही है।
Scooter Parking Dispute in Colony Reaches Supreme Court
यह मामला कोलकाता के सर्वे पार्क थाना क्षेत्र के अंतर्गत 'कनिष्का अपार्टमेंट' (जनता रोड) का है। घटना 11 अक्टूबर 2022 की रात (लक्ष्मी पूजा की रात) करीब 9:20 बजे की है। शिकायतकर्ता सुशील चक्रवर्ती (77 वर्ष), जो अलीपुर जिला एवं सत्र न्यायालय के पूर्व लोक अभियोजक हैं, ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति, सौरव सेन, अपार्टमेंट का मुख्य दरवाजा तोड़कर अंदर घुस आया। जब चक्रवर्ती ने इसका विरोध किया, तो विवाद बढ़ गया। आरोप के अनुसार, अपीलकर्ता सजल बोस, चंडीदास जोआर्डार और सौत्रिक जोआर्डार सहित अन्य लोग वहां एकत्र हो गए। शिकायतकर्ता का दावा था कि आरोपियों ने उन्हें और उनके परिवार को अपशब्द कहे, मारपीट की और उनके सीने में लगे पेसमेकर को निशाना बनाकर हमला किया। इसके अलावा, महिलाओं के साथ अभद्रता (धारा 354) और जान से मारने की धमकी देने के आरोप भी लगाए गए थे।
इसके अलावा दोनों पक्षों के बीच में एक पुराना विवाद भी चल रहा था। सौरव सेन, बिजली के मीटर बॉक्स के पास अपना स्कूटर खड़ा करते थे जिसके कारण श्री सुशील चक्रवर्ती को परेशानी होती थी। उन्होंने इसकी शिकायत लोकल पुलिस स्टेशन में भी की थी। पुलिस ने सौरव को बुलाकर, स्कूटर पार्किंग की जगह बदलने के लिए निर्देशित किया था लेकिन सौरव ने पुलिस के निर्देश का पालन नहीं किया। इस बात को लेकर फिर से विवाद हुआ।
दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क
अपीलकर्ताओं (जिनको इस मामले में आरोपी बनाया गया) के वकील (वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि, यह मामला पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण है और व्यक्तिगत रंजिश के कारण बदला लेने के लिए दर्ज कराया गया है। अपीलकर्ता केवल 'नेक व्यक्ति' (good Samaritans) के रूप में विवाद शांत कराने पहुंचे थे। CCTV फुटेज स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जब मुख्य विवाद हुआ, तब अपीलकर्ता वहां मौजूद ही नहीं थे; वे बाद में पहुंचे और केवल मामले को सुलझाने का प्रयास कर रहे थे। शिकायत में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं।
शिकायतकर्ता के वकील (वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा) मैं सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि, आरोपियों ने एक गैर-कानूनी जमावड़ा (unlawful assembly) बनाया और एक बुजुर्ग व्यक्ति पर हमला किया, जिसके दिल में पेसमेकर लगा है। साक्षी डॉ. अपराजिता बंदोपाध्याय के बयान (धारा 164 CrPC) के अनुसार, आरोपियों ने पेसमेकर पर चप्पल फेंकी और लाइटर से जलाने की कोशिश की।
मेडिकल रिपोर्ट पुष्टि करती है कि शिकायतकर्ता और उनके परिवार को चोटें आई थीं।
न्यायालय की विशेष टिप्पणी
न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वयं CCTV फुटेज का सूक्ष्म निरीक्षण किया। कोर्ट की कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां निम्नलिखित थीं:
फुटेज से स्पष्ट हुआ कि जब कथित मारपीट हुई, तब अपीलकर्ता वहां मौजूद नहीं थे। वे बाद में पहुंचे। वीडियो में अपीलकर्ता हिंसा करते नहीं, बल्कि लोगों को शांत करते और संयम बरतने की सलाह देते दिखाई दे रहे हैं।
साक्षी द्वारा लगाए गए 'लाइटर से जलाने' जैसे आरोप CCTV फुटेज के सामने पूरी तरह गलत साबित हुए।
कोर्ट ने कहा कि जब साक्ष्य स्पष्ट रूप से आरोपियों को निर्दोष दिखाते हैं, तो उन्हें मुकदमे की लंबी प्रक्रिया से गुजारना न्याय का अपमान होगा। कोर्ट ने 'भजन लाल' और 'प्रदीप कुमार केसरवानी' मामलों के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि जहां आरोप 'बेतुके और अविश्वसनीय' हों, वहां कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
न्यायाधीश विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें अपीलकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सजल बोस, चंडीदास जोआर्डार और सौत्रिक जोआर्डार के खिलाफ सर्वे पार्क पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 150/2022 और अलीपुर की अदालत में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया। कोर्ट ने माना कि यह मामूली विवाद को आपराधिक रंग देने का प्रयास था।

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