Labor Rights - नई दिल्ली, 24 मई 2026: श्रमिक मतलब अस्थाई कर्मचारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि कर्मचारियों से एक बार नियतीकरण का वादा करने के बाद, वादे से मुकर नहीं सकते हैं। किसी भी प्रकार की प्रशासनिक गलती के लिए, कर्मचारियों को समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।
Supreme Court Landmark Ruling: Governments Cannot Back Out From Promise of Regularising Temporary Employees
असम सरकार ने 1980 के दशक से ही सड़कों के निर्माण और रखरखाव जैसे कार्यों के लिए बड़ी संख्या में मस्टर रोल श्रमिकों को नियुक्त किया था। 22 जुलाई, 2005 को राज्य कैबिनेट ने एक बड़ा फैसला लिया कि 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त किए गए सभी मस्टर रोल और वर्क चार्ज्ड श्रमिकों को नियमित किया जाएगा। इस नीति के तहत लगभग 30,000 श्रमिकों को नियमित कर दिया गया।
हालांकि, सुखेंदु भट्टाचार्जी (Sukhendu Bhattacharjee) और कई अन्य श्रमिक इस लाभ से वंचित रह गए। इसका मुख्य कारण श्रमिकों की कोई गलती नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों में नाम की स्पेलिंग गलत होना या लिपिकीय त्रुटियां (Clerical errors) थीं। जब इन श्रमिकों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तो सरकार ने 'उमादेवी मामले' के कानूनी दांव-पेच का सहारा लेकर उन्हें नियमित करने से मना कर दिया।
श्रमिकों (अपीलकर्ताओं) का पक्ष:
उन्होंने तर्क दिया कि वे उन 30,000 श्रमिकों के समान ही हैं जिन्हें नियमित किया गया है, इसलिए अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत उन्हें भी वही लाभ मिलना चाहिए। उनका कहना था कि वे दशकों से निरंतर सेवा दे रहे हैं और केवल प्रशासनिक गलतियों के कारण उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए। राज्य सरकार ने पहले अदालत में वचन (Undertaking) दिया था कि वह नीति बनाएगी, लेकिन बाद में वह अपने वादे से मुकर गई।
असम सरकार (प्रतिवादी) का पक्ष:
सरकार ने तर्क दिया कि ये नियुक्तियां 'स्वीकृत पदों' (Sanctioned posts) के विरुद्ध नहीं थीं। सरकार ने 'उमादेवी बनाम कर्नाटक राज्य' के प्रसिद्ध फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जो नियुक्तियां कानूनी प्रक्रिया के बाहर हुई हैं, उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता। राज्य का यह भी कहना था कि नियमितीकरण से खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।
न्यायालय की विशेष टिप्पणियाँ और आधार
न्यायालय ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत की कुछ प्रमुख टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं:
समानता का अधिकार (Equality Before Law): न्यायालय ने कहा कि यदि एक ही श्रेणी के 30,000 लोगों को लाभ मिला है, तो बाकी बचे कुछ लोगों को केवल तकनीकी आधार पर बाहर रखना भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है।
उमादेवी फैसले का गलत इस्तेमाल (Weaponizing Precedents): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमादेवी फैसले का उद्देश्य 'चोर दरवाजे' से होने वाली नियुक्तियों को रोकना था, न कि उन गरीब श्रमिकों को सजा देना जो दशकों से राज्य की अनिवार्य सेवाएं दे रहे हैं। न्यायालय ने सख्त लहजे में कहा कि राज्य उमादेवी मामले को एक 'ढाल' या 'हथियार' की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता।
राज्य को एक 'मॉडल एम्प्लॉयर' की तरह व्यवहार करना चाहिए। अदालत में एक बार वादा करने के बाद उससे मुकर जाना (Approbate and Reprobate) प्रशासनिक निष्पक्षता के खिलाफ है।
प्रशासनिक चूक की सजा श्रमिकों को क्यों?
स्पेलिंग की गलती या नाम छूट जाने जैसी गलतियां सरकार की थीं, जिसके लिए श्रमिकों को उनके हक से वंचित करना "घोर अन्याय" है।
The Final Verdict
सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय विस्तार पूर्वक सुनाते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
नियमितीकरण का आदेश: सभी पात्र अपीलकर्ताओं को उसी तारीख से नियमित माना जाएगा, जिस तारीख से अन्य 30,000 कर्मचारियों को लाभ दिया गया था।
यदि पद खाली नहीं हैं, तो राज्य सरकार इन श्रमिकों के लिए सुपरन्यूमरी पोस्ट (Supernumerary posts - विशेष अतिरिक्त पद) सृजित करेगी। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी विभाग में पद नहीं हैं, तो केवल इन श्रमिकों को समायोजित करने के लिए विशेष पद बनाए जाएंगे जो उनके सेवानिवृत्त होते ही समाप्त हो जाएंगे।
श्रमिकों को वेतन निर्धारण, सेवा की निरंतरता और सभी पेंशन संबंधी लाभ (Pensionary benefits) दिए जाएंगे।
जो श्रमिक रिटायर हो चुके हैं उन्हें काल्पनिक नियमितीकरण (Notional regularization) के आधार पर पेंशन दी जाएगी। जो श्रमिक इस लंबी लड़ाई के दौरान गुजर गए, उनके कानूनी वारिसों को बकाया राशि और लाभ दिए जाएंगे।
समय सीमा: सरकार को यह पूरी प्रक्रिया और बकाया भुगतान एक वर्ष के भीतर पूरा करना होगा।
निष्कर्ष (Conclusion): यह निर्णय उन हजारों श्रमिकों के लिए न्याय की जीत है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सरकारी सेवा में लगा दी। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि Social Economic Justice (सामाजिक आर्थिक न्याय) सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है और तकनीकी बारीकियां मानवीय गरिमा और समानता के अधिकार के आड़े नहीं आनी चाहिए।

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