जूनियर वकीलों को हाई कोर्ट से निराशा, बार काउंसिल इलेक्शन वाली याचिका खारिज

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2026
: भारत देश के तमाम जूनियर वकीलों के लिए यह खबर थोड़ी सी निराशा वाली है। हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें जूनियर वकीलों ने 20% सीटों पर अपने सामान प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ चुनाव लड़ने का अधिकार मांगा था। 

Junior Lawyers Disappointed as Supreme Court Dismisses Plea on Bar Council Elections

बात कुछ ऐसी है कि बार काउंसिल के चुनाव में 10 साल से ज्यादा एक्सपीरियंस वाले वकीलों के लिए 50% सीट आरक्षित होती है। मतलब इन सीटों पर जूनियर वकील नहीं लड़ सकते। 30% सीट महिला वकीलों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं। बची हुई 20% सीट अनारक्षित छोड़ दी गई है, इसका मतलब हुआ कि इन सीटों पर सीनियर वकील भी चुनाव लड़ सकते हैं। जूनियर वकीलों का कहना है कि जब 50% सीटों पर सीनियर वकील आपस में चुनाव लड़ लेते हैं और जूनियर वकील को उनके सामने चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है तो फिर बची हुई 20% सीटों पर जूनियर वकीलों को आपस में चुनाव लड़ने दीजिए। यहां सीनियर वकीलों को क्यों अलाउ किया जा रहा है। 

बार काउंसिल इलेक्शन में जूनियर एडवोकेट रमेश चंद्र सिंह की याचिका

यह अपील अधिवक्ता रमेश चंद्र सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने फरवरी 2026 में हुए बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के चुनावों में भाग लिया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि BDC की कुल 23 निर्वाचित सीटों में से 12 सीटें उन वकीलों के लिए आरक्षित हैं जिनके पास 10 वर्ष से अधिक का अनुभव है, और 5 सीटें महिला वकीलों के लिए आरक्षित की गई हैं। सिंह ने मांग की थी कि शेष 6 सीटों को विशेष रूप से 10 वर्ष से कम अनुभव वाले 'युवा वकीलों' के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। 

याचिकाकर्ता के तर्क 

अधिवक्ता श्री रमेश चंद्र सिंह ने अदालत में स्वयं पैरवी करते हुए तर्क दिया कि युवा वकीलों के लिए आरक्षण न होना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है। उनका कहना था कि वर्तमान चुनावी ढांचा युवा वकीलों को वरिष्ठ सदस्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर करता है, जिससे उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता और यह 'समानुपातिक प्रतिनिधित्व' के सिद्धांत के खिलाफ है।

अदालत का फैसला और टिप्पणियाँ 

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि एडवोकेट एक्ट की धारा 3(2)(b) के तहत वरिष्ठों के लिए 50% आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार महिलाओं के लिए 30% आरक्षण के बाद, यदि शेष 20% सीटें भी युवाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं, तो यह 100% आरक्षण हो जाएगा। यह एडवोकेट एक्ट के प्रावधानों के साथ असंगत है। पीठ ने सिंगल जज के पिछले फैसले पर सहमति जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पास शेष सीटों पर आरक्षण मांगने का कोई 'निहित अधिकार' (Vested Right) नहीं है। 

अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने चुनाव प्रक्रिया पूरी होने और वोटों की गिनती शुरू होने के बाद 14 मार्च, 2026 को याचिका दायर की थी, जो अत्यधिक देरी (Laches) को दर्शाता है। पीठ ने एम. वरधन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव संबंधी किसी भी शिकायत के लिए व्यक्ति को 'हाई-पावर्ड इलेक्शन कमेटी' के पास जाना चाहिए, न कि सीधे हाईकोर्ट।

निष्कर्ष अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी और इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के साथ ही युवा वकीलों के लिए विशेष आरक्षण की मांग वाली अपील और लंबित आवेदनों को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया गया। इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से अधिवक्ता प्रीतपाल सिंह, तनुप्रीत कौर और अन्य उपस्थित हुए।
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