हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: धोखाधड़ी के मामले किस थाने में दर्ज हो सकते हैं, कौन इन्वेस्टिगेशन करेगा

Updesh Awasthee
इंदौर, 6 अप्रैल 2026
: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की इंदौर बेंच ने एक लैंडमार्क जजमेंट दिया है। धोखाधड़ी के ऐसे मामले जब फरियादी किसी एक शहर में और अपराधी दूसरे शहर में होता है तो, सबसे बड़ा विवाद यह होता है कि मामला किस थाने में दर्ज किया जाएगा। हाई कोर्ट के इस फैसले में, इसी विवाद का निराकरण किया गया है।

High Court Clarifies Jurisdiction in Fraud Cases, Who Will Investigate

यह मामला एक गंभीर धोखाधड़ी और पहचान की चोरी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता विष्णु कुमार, जो इंदौर के निवासी हैं, मैसर्स जनक इंटरमीडिएट्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s Janak Intermediates Pvt. Ltd.) के पूर्व प्रबंध निदेशक हैं। उनकी कंपनी ने मैसर्स महानसर इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड (M/s Mahansar Engineering Pvt. Ltd.) के साथ व्यापारिक लेनदेन किया था, जिसके तहत उन्हें 5 लाख रुपये का भुगतान मिलना था। जब विष्णु कुमार ने भुगतान के बारे में पूछताछ की, तो उन्हें बताया गया कि भुगतान पहले ही तीन चेक के माध्यम से किया जा चुका है। ये चेक बैंक ऑफ बड़ौदा, रिक्लेमेशन शाखा, मुंबई (Bank of Baroda, Reclamation Branch Mumbai) पर आहरित थे।

धोखाधड़ी का खुलासा:
जांच करने पर पता चला कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने बैंक ऑफ पंजाब लिमिटेड, बांद्रा (पश्चिम) शाखा, बॉम्बे (Bank of Punjab Ltd. Bandra West Branch) में विष्णु कुमार की कंपनी के नाम पर एक फर्जी चालू खाता (संख्या 4001528) खोल रखा था। आश्चर्यजनक रूप से, इस फर्जी खाते को खोलने के लिए विष्णु कुमार और उनके दिवंगत पिता (जिनका निधन 1994 में हो गया था) के दस्तावेजों और साख का उपयोग किया गया था। यह फर्जी खाता 1997 में खोला गया था और इसी खाते में वे तीनों चेक भुना लिए गए थे।

विष्णु कुमार ने इस जानकारी को प्राप्त करने के लिए पहले एक रिट याचिका (WP No. 9855/2012) दायर की थी, जिसके बाद बैंक ने उन्हें 2013 में दस्तावेज सौंपे। इसके बाद उन्होंने 11 अक्टूबर, 2013 को थाना एम.जी. रोड, इंदौर और पुलिस अधीक्षक (पूर्वी क्षेत्र), इंदौर में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया। इसलिए मामला हाई कोर्ट में पहुंचा। हाई कोर्ट से निवेदन किया गया कि वह पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए आदेश दें।

दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील - वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विशाल बाहेती (सहयोगी श्री अर्जुन पाठक) द्वारा तर्क दिया गया कि भले ही बैंक खाता मुंबई में खुला हो, लेकिन 'वाद-कारण' (Cause of Action) का हिस्सा इंदौर में उत्पन्न होता है क्योंकि कंपनी के निदेशक इंदौर में रहते हैं।
उन्होंने CRPC की धारा 178 का हवाला देते हुए कहा कि जब अपराध एक से अधिक क्षेत्रों में फैला हो या उसका प्रभाव अन्य स्थान पर हो, तो जांच किसी भी स्थान पर हो सकती है।

राज्य सरकार के वकील - सरकारी अधिवक्ता (GA) श्री हेमंत शर्मा ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूंकि फर्जी खाता मुंबई में खोला गया और बैंकिंग लेनदेन वहीं हुए, इसलिए याचिकाकर्ता को मुंबई के संबंधित पुलिस स्टेशन में ही शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

न्यायालय की विशेष टिप्पणी और कानूनी विश्लेषण

न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
अदालत ने CRPC की धारा 178 का विश्लेषण करते हुए कहा कि जब कोई अपराध आंशिक रूप से एक क्षेत्र में और आंशिक रूप से दूसरे में होता है, तो दोनों में से कहीं भी जांच हो सकती है। न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि "धोखाधड़ी का वास्तविक अपराध मुंबई में हुआ होगा, लेकिन याचिकाकर्ता ने उसकी क्षति (Injury) इंदौर में सही है, क्योंकि वह इंदौर का निवासी है"।

कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया कि आरोपी ने एक मृत व्यक्ति (याचिकाकर्ता के पिता) के दस्तावेजों का उपयोग करके धोखाधड़ी की है।

न्यायालय का निर्णय

उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने प्रतिवादियों (पुलिस प्रशासन) को निर्देश दिया कि, याचिकाकर्ता द्वारा 11.10.2013 को दी गई शिकायतों के आधार पर तत्काल FIR दर्ज की जाए। मामले की विधि सम्मत जांच शुरू की जाए और सक्षम न्यायालय में आरोप पत्र पेश किया जाए। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि पीड़ित अपने निवास स्थान पर पुलिस कार्रवाई की मांग कर सकता है, यदि अपराध का प्रभाव वहां महसूस किया गया हो।
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