क्रिकेट की बॉल तो आपने भी देखी होगी और हो सकता है खेल भी हो लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह क्रिकेट की बॉल कोई सामान्य गेंद नहीं है। कई ऐसी बातें हैं जो इसको स्पेशल बनाती है। आज हम आपको क्रिकेट की ज्ञान के बारे में 10 रोचक जानकारियां देने जा रहे हैं, इनमें से कुछ प्रश्न कभी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आते हैं:-
क्रिकेट की बॉल का वजन कितना होता है
इस प्रश्न का उत्तर ज्यादातर लोग यह देते हैं कि क्रिकेट की गेंद का वजन 155.9 ग्राम और 163 ग्राम के बीच होता है। विकिपीडिया पर भी यही लिखा हुआ है। लेकिन वजन के मामले में बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। सही उत्तर कुछ इस प्रकार है:-
- पुरुष क्रिकेट: गेंद का वजन 155.9 और 163 ग्राम के बीच होता है।
- महिला क्रिकेट: गेंद का वजन 140 से 151 ग्राम के बीच होता है।
- जूनियर क्रिकेट (अंडर -13): गेंद का वजन 133 और 144 ग्राम के बीच होता है।
एक्स्ट्रा ज्ञान की बात यह है कि सिर्फ वजन ही नहीं बल्कि क्रिकेट बॉल की परिधि 8 - 13/16 और 9 (224 और 229 मिलीमीटर) के बीच होनी चाहिए।
क्रिकेट बॉल का वजन क्यों निर्धारित किया गया
शुरुआत में क्रिकेट की बॉल आयोजक अपनी अपनी सुविधा के अनुसार बनवाया करते थे। बाद में कुछ कंपनियां क्रिकेट बॉल बनाने लगी। सभी कंपनियां अलग-अलग वजन और आकार की गेंद बनाया करती थीं। निश्चित रूप से इंटरनेशनल क्रिकेट के लिए यह गलत बात है। फाइनली डिसाइड किया गया कि क्रिकेट बॉल के वजन, आकार और उस में प्रयुक्त होने वाली सामग्री को लेकर गाइड लाइन तय की जाएगी। मनुष्य की गेंद फेंकने की शक्ति और बार-बार पीटे जाने पर भी ज्यादा समय तक सुरक्षित रहने के फार्मूले पर क्रिकेट बॉल का निर्धारण किया गया। एक ऐसी बोर्ड जिसे आसानी से फेंका जा सके और कैच किया जा सके।
इंटरनेशनल क्रिकेट और T20 क्रिकेट की बॉल में क्या अंतर है
20-20 की शुरुआत के बाद थोड़ी नरम सफेद गेंदों का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसे क्रिकेट के फटाफट स्वरूप के हिसाब से डिजाइन किया गया है और सभी सफेद गेंदों के बारे में कहा जाता है कि टेस्ट मैचों की मानक गेंदों के मुकाबले इन्हें अधिकतम 29.5 मीटर ज्यादा दूर तक मारा जा सकता है। हवा में भी यह ज्यादा रफ्तार से चलती है और इसे एक-दिवसीय और 20-20 की जरूरत के मुताबिक ही तैयार किया गया है। इससे स्ट्राइक रेट और मैच में लगने वाले छक्कों की संख्या भी बढ़ती है।
क्रिकेट की बॉल कौन बनाता है
क्रिकेट की बाल बनाने का काम बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया जाता है दुनिया की तीन बड़ी कंपनियों में:-
- Dukes (इंग्लैंड)
- Kookaburra (ऑस्ट्रेलिया)
- SG (भारत)
का नाम आता है। जिन लोगों को नहीं पता उनके लिए यह जानकारी गर्व की अनुभूति भी हो सकती है।
कैसे तय होता है कि मैच में किस कंपनी की क्रिकेट बॉल का उपयोग किया जाएगा
अब मजे की बात देखिए, यदि मैच भारत में होगा तो SG (भारत) की क्रिकेट बॉल से खेला जाएगा इंग्लैंड में होगा तो इंग्लैंड में होगा तो Dukes (इंग्लैंड) और ऑस्ट्रेलिया अथवा दक्षिण अफ्रीका में होगा तो Kookaburra (ऑस्ट्रेलिया) से खेला जाएगा। इसका मतलब हुआ कि जो मेजबान देश है, उसका क्रिकेट बोर्ड फाइनल करेगा कि मैच में किस बल का उपयोग किया जाएगा। यह नियम बड़ी चतुराई के साथ इंग्लैंड वालों ने बनाया क्योंकि उनकी क्रिकेट बॉल Dukes की सिलाई हाथ से होती है जिससे इसकी सीम ज्यादा देर तक उभरी रहती है और स्विंग में मदद करती है। जबकि भारत और ऑस्ट्रेलिया की बॉल तेज गति की गेंदबाजों के लिए बनाई जाती है।
यह तो कोई टेस्ट मैच की बात लेकिन T20 के नियम अलग है। T20 टूर्नामेंट में सभी नियम ICC द्वारा तय किए गए हैं। लोकल का क्रिकेट बोर्ड केवल पैसे कमाता है। ICC के नियमों के अनुसार T20 टूर्नामेंट में मुख्यतः Kookaburra का उपयोग किया जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं क्रिकेट बॉल का कलर सफेद होता है क्योंकि सफेद रंग की गेंद टीवी विजिबिलिटी और ब्रॉडकास्ट कंसिस्टेंसी होती है।
क्रिकेट बॉल का सिलेक्शन कैसे करते हैं
- Pitch Conditions (उछाल, नमी, घास)
- Weather (ह्यूमिडिटी, हवा)
- Ball Durability (कितने ओवर तक टिकेगी)
- Swing Behavior (सीम और स्विंग का प्रभाव)
- Broadcast Visibility (खासकर white ball क्रिकेट में)
क्रिकेट बॉल के कलर का सिलेक्शन
लाल बॉल: टेस्ट मैचों के लिए, जो सामान्य तौर पर दिन में होते हैं। लाल रंग की क्रिकेट बॉल ज्यादा स्विंग लेती है और टिकाऊ होती है। लाल रंग की क्रिकेट बॉल की उम्र 80 ओवर होती है। इसके बाद रिटायर कर दिया जाता है।
सफेद बॉल: ODI और T20 में रात के समय स्पष्ट दिखने के लिए, लेकिन यह जल्दी खराब हो जाती है।
गुलाबी (Pink) बॉल: Day-Night टेस्ट मैचों में। 2015 में पहली बार इस्तेमाल हुई।
अन्य रोचक बातें
एक टेस्ट मैच में औसतन 10-12 बॉल इस्तेमाल होती हैं।
बॉल 80 ओवर के बाद काफी खराब हो जाती है, इसलिए पुरानी बॉल से स्पिनरों को मदद मिलती है।
ICC नियम: मैच से पहले बॉल 4.5 सेंटीमीटर ऊँचाई से गिराकर टेस्ट की जाती है (bounce चेक)।
2019 विश्व कप फाइनल में ट्रेंट बोल्ट की गेंद पर मार्क वुड का कैच – वो बॉल बहुत खास थी!
बॉल को "रफ" करने पर (स्क्रैच करके) रिवर्स स्विंग बढ़ती है, लेकिन यह नियमों के दायरे में होना चाहिए।
खिलाड़ी क्रिकेट बॉल को अपने कपड़ों पर बार-बार क्यों रगड़ते हैं
क्या आपने गौर किया है कि खिलाड़ी गेंद को अपने कपड़ों पर बार-बार रगड़ते हैं? इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। गेंद के एक हिस्से को चमकाकर (Shiny) और दूसरे को खुरदरा (Rough) रखकर खिलाड़ी हवा में दबाव का अंतर पैदा करते हैं। इसी अंतर की वजह से गेंद हवा में दिशा बदलती है, जिसे हम 'स्विंग' कहते हैं।
नई बाल का खौफ और पुरानी बाल का जादू
तेज गेंदबाजी के लिए नई बाल हमेशा अच्छी होती है। यही कारण है कि विकेट लेने के लिए शुरुआत के 15 ओवर काफी अच्छे माने जाते हैं। कई बड़े बैट्समैन, न्यू क्रिकेट बॉल का सामना करने से डरते हैं। जब गेंद बहुत पुरानी हो जाती है (लगभग 40-50 ओवर बाद), तो वह साधारण स्विंग के बजाय 'रिवर्स स्विंग' करने लगती है। इसमें गेंद भारी (चमकदार) हिस्से की तरफ मुड़ने के बजाय हल्के (खुरदरे) हिस्से की तरफ मुड़ती है। यह कला इतनी पेचीदा है कि इसे सीखने में गेंदबाजों को सालों लग जाते हैं।
और अंत में गर्व की बात
दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेट बॉल पंजाब (भारत) के पटियाला में बनाई गई थी? इसका वजन लगभग 45 किलोग्राम था और घेरा (Circumference) 7 फीट से भी ज्यादा था। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article

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