जबलपुर, 24 अप्रैल 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की कार्यप्रणाली पर सख्त नाराजगी जताते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने बैंक द्वारा एक दिवंगत कर्मचारी के बेटे की नियुक्ति के आवेदन को खारिज करने के आदेश को "मनमाना" और "कानूनी रूप से गलत" करार देते हुए रद्द कर दिया है।
Compassionate Appointment Case: Madhya Pradesh HC Slaps ₹50,000 Fine on Union Bank
यह मामला रीवा जिले के सागरा शाखा में 'दफ्तरी' के रूप में कार्यरत रहे स्वर्गीय शंकर प्रसाद कोल के पुत्र निखिल कोल से जुड़ा है। शंकर प्रसाद ने बैंक में 22 साल से अधिक समय तक निरंतर सेवा की थी, लेकिन 7 अगस्त 2016 को दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। निखिल की माँ का निधन पहले ही 2012 में हो चुका था, जिसके कारण पिता की मृत्यु के बाद निखिल और उनकी तीन छोटी बहनों (जो उस समय स्कूल में पढ़ रही थीं) के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। 20 वर्षीय निखिल पर अपनी पत्नी, एक साल के बेटे और तीन बहनों की जिम्मेदारी आ गई।
बैंक की मनमानी: 'असंतोषजनक रिकॉर्ड' का लगाया बहाना
निखिल ने बैंक की 2015 की योजना के तहत चपरासी/मैसेंजर के पद के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया था। लेकिन, बैंक ने 30 जनवरी 2018 को एक आदेश जारी कर आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि स्वर्गीय शंकर प्रसाद कोल का "सेवा रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं था"। निखिल ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
अदालत की कड़ी टिप्पणियां और जुर्माना
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि बैंक की अनुकंपा नियुक्ति नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो दिवंगत कर्मचारी के पिछले सेवा रिकॉर्ड के आधार पर उसके आश्रित को नौकरी देने से रोकता हो। कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
बैंक ने 2019 में नोटिस मिलने के बावजूद अदालत में अपना कोई जवाब पेश नहीं किया, जिसे कोर्ट ने बैंक का "अड़ियल और एकतरफा दृष्टिकोण" माना।
अदालत ने कहा कि बैंक ने नियुक्ति से इनकार करने के लिए एक ऐसा कारण ("असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड") गढ़ा जो बैंक की अपनी लिखित नीति में मौजूद ही नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल वित्तीय संकट से उबारना है, न कि उन्हें कानूनी लड़ाइयों में उलझाना।
अंतिम आदेश
हाई कोर्ट ने बैंक के पुराने आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया है कि:
बैंक 60 दिनों के भीतर निखिल के आवेदन पर पुनर्विचार करे और पिता के सेवा रिकॉर्ड को आधार बनाए बिना नए सिरे से आदेश पारित करे।
याचिकाकर्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना और वित्तीय कठिनाइयों के मुआवजे के रूप में बैंक पर 50,000 रुपये का जुर्माना (Cost) लगाया गया है, जिसे 30 दिनों के भीतर चुकाना होगा।
अदालत ने अधिकारियों को चेतावनी भी दी है कि भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में बिना किसी ठोस नीतिगत आधार के या मनगढ़ंत कारणों से आवेदन खारिज न किए जाएं।

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