आर्यभट्ट ने 23 साल की उम्र में ऐसा क्या कर दिया था, जो 1500 साल बाद भी उनको याद रखें - जयंती विशेष

Updesh Awasthee
भारत में आर्यभट्ट को कौन जानता है, ज्यादातर लोग नहीं जानते, लेकिन रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव जैसे प्राचीन इतिहास के विद्वान लोग सोशल मीडिया पर आर्यभट्ट को याद कर रहे हैं। बता रहे हैं कि आज आर्यभट्ट की जयंती है। यह भी बता रहे हैं कि वह The iconic man of Indian Scientific Temper हैं। यदि ऐसा है तो चलिए अपन भी 1 मिनट में जान लेते हैं आर्यभट्ट ने 23 साल की उम्र में ऐसा क्या कर दिया था जो हम उनको 1500 साल बाद भी याद रखें। 

Why Aryabhata Is Still Remembered After 1500 Years: Discover His Greatest Contributions

श्री मनोज श्रीवास्तव बताते हैं कि, आज से करीब 1500 साल पहले (476–550 ईस्वी), जब दुनिया के पास न कोई टेलिस्कोप था और न ही सुपरकंप्यूटर, तब मात्र 23 साल की उम्र में एक युवक ने 'आर्यभटीय' जैसा क्रांतिकारी ग्रन्थ लिख दिया। सिर्फ 118 श्लोकों में सिमटे इस ग्रन्थ में गणित (Maths), खगोलविज्ञान (Astronomy) और त्रिकोणमिति (Trigonometry) की ऐसी स्थापनाएं हैं जिन्हें आज का मॉडर्न साइंस भी सलाम करता है। 

जब दुनिया रुकी थी, तब आर्यभट ने कहा - 'Earth Rotates!'

उस दौर में पूरा विश्व मानता था कि आकाश घूम रहा है और पृथ्वी स्थिर है। तब आर्यभट ने एक बेहद 'साहसी और कूल' उपमा दी। उन्होंने गोलपाद के 9वें श्लोक में कहा:
"अनुलोमगतिर्नावस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। 
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥"
यानी जैसे नाव में बैठा इंसान आगे बढ़ते समय किनारे के पेड़ों को पीछे की ओर जाते देखता है, वैसे ही पृथ्वी के घूमने के कारण हमें तारे स्थिर होते हुए भी चलते दिखाई देते हैं। उन्होंने साफ़ कर दिया कि तारों का पश्चिम जाना एक भ्रम है, असल में पृथ्वी पूर्व दिशा की ओर अपनी धुरी (axis) पर घूम रही है।

यूरोप को यह बात समझने में 1000 साल से ज्यादा लग गए। कोपर्निकस ने इसे 1543 में माना और गैलीलियो को तो इसी सच के लिए 1633 में नजरबन्द कर दिया गया था। आर्यभट की गणना के अनुसार पृथ्वी अपनी अक्ष पर घूमने में जो समय लेती है, वह आधुनिक विज्ञान के 23 घण्टे 56 मिनट के मान के एकदम करीब है।

π (Pi) और वैज्ञानिक ईमानदारी

आज हम π का मान 3.1416 याद करते हैं, लेकिन आर्यभट ने गणितपाद में इसे पहले ही डिकोड कर दिया था:
"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। 
अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"
इसका कैलकुलेशन निकलता है - 3.1416
यहाँ सबसे खास बात उनकी 'Scientific Honesty' है। उन्होंने श्लोक में 'आसन्न' शब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ है 'सन्निकट' या approximate। उन्हें पता था कि π एक अपरिमेय (irrational) संख्या है, जिसे आज का विज्ञान भी मानता है।

ग्रहण: राहु-केतु नहीं, बल्कि छाया का खेल

5वीं शताब्दी में जब लोग ग्रहण (Eclipse) को किसी दैवीय प्रकोप या राहु-केतु का ग्रास मानते थे, तब आर्यभट ने इसे 'Shadow Science' से समझाया:
"छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया। 
मासि मासि चन्द्रार्काभ्यां तत् सूर्यग्रहणं ग्रहणम्॥"
यानी चन्द्रमा सूर्य को ढकता है तो सूर्यग्रहण होता है, और पृथ्वी की विशाल छाया चन्द्रमा को ढकती है तो चन्द्रग्रहण होता है। आज NASA भी उसी थ्योरी पर काम करता है जो आर्यभट ने सदियों पहले दी थी।

'Sine' शब्द की भारतीय यात्रा

क्या आप जानते हैं कि ट्रिग्नोमेट्री का सबसे बेसिक शब्द 'Sine' असल में भारत की देन है? आर्यभट का शब्द था 'अर्धज्या' (आधा धनुष), जो बाद में 'जीवा' बना। अरब विद्वानों ने इसे 'jīb' लिखा, जिसे लैटिन अनुवादकों ने गलती से 'jaib' (वक्ष/खाँच) समझकर 'sinus' कर दिया। आज का 'Sine' इसी का मॉडर्न अवतार है।

इसके अलावा, उन्होंने ग्रहों की कक्षा को Heliocentric (सूर्य-केन्द्रीय) संकेत दिया और बताया कि सभी ग्रह और चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं।
"भास्करतो विमलकिरणा भास्वरमुखाः सर्वग्रहा लोकाः। 
सूर्यसमीपं गत्वाऽस्तमयन्ति तदाभासाः॥"
उन्होंने नक्षत्र वर्ष (Sidereal Year) की गणना 365.258 दिन की थी, जो आधुनिक मापन से मात्र 3 मिनट 30 सेकंड का अंतर रखती है- बिना किसी मॉडर्न गैजेट के यह उपलब्धि किसी चमत्कार से कम नहीं!

निष्कर्ष

विज्ञान कभी खुद को अंतिम सत्य नहीं कहता, वह हमेशा इवोल्यूशन (evolution) में विश्वास रखता है। मुमकिन है कि पुरानी कुछ थ्योरीज समय के साथ बदलें, लेकिन जिस इंसान ने सबसे पहले इन रहस्यों से पर्दा उठाया, उसे सेलिब्रेट करना तो बनता है। आर्यभट सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक विरासत का वो सितारा है जो आज भी हमें रास्ता दिखा रहा है।
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