लखनऊ, 28 मई 2026: हाई कोर्ट ऑफ़ उत्तर प्रदेश की लखनऊ बेंच में RTE ACT 2009 (The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) की धारा 23(2) की वैधता को चुनौती दी गई है। हाई कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और भारत के अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा है।
RTE-TET Case: Attorney General Asked to Respond on Old Teachers Issue
टीचर्स इंडिया की ओर से शिक्षकों द्वारा दाखिल याचिका में कहा गया है कि RTE एक्ट 2009 लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी (TET) परीक्षा पास करने की शर्त थोपना गलत है। RTE एक्ट की धारा 23(1) केंद्र सरकार को नई नियुक्तियों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने का अधिकार देती है और सरकार ने NCTE को अकादमिक अथॉरिटी बनाया है। जबकि धारा 23(2) के दोनों परन्तुक पुरानी नियुक्तियों पर भी सेवा में बने रहने के लिए TET लागू करते हैं, जो धारा 23(1) के ही विरुद्ध है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सरकारी नौकरियों में समान अवसर) का भी उल्लंघन करता है।
RTE ACT 2009 की धारा 23(2) में क्या लिखा है
इस अधिनियम के प्रारंभ होने के समय जो शिक्षक कार्यरत हैं और जिनके पास निर्धारित न्यूनतम योग्यता नहीं है, उन्हें अधिनियम लागू होने के पांच वर्ष की अवधि के भीतर ऐसी योग्यता हासिल करनी होगी।
पहला परन्तुक (Proviso): इस अधिनियम के शुरू होने पर जो शिक्षक न्यूनतम योग्यता नहीं रखते, उन्हें 5 वर्ष में प्राप्त करनी होगी।
दूसरा परन्तुक (2017 संशोधन द्वारा जोड़ा गया): 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या सेवा में मौजूद हर शिक्षक को, यदि न्यूनतम योग्यता (TET सहित) नहीं है, तो 4 वर्ष (31 मार्च 2019 तक) में प्राप्त करनी होगी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि RTE एक्ट लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए TET पास करने की मजबूरी अनुचित और अवैध है। याचिकाकर्ताओं की ओर से हिमांशु राघवे और दुर्गा प्रसाद शुक्ला ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादियों की ओर से ASGI, अनघ मिश्रा, CSC और रणविजय सिंह उपस्थित थे।
यह याचिका उत्तर प्रदेश समेत देशभर के लाखों पुराने शिक्षकों के भविष्य से जुड़ी हुई है। कोर्ट का अंतिम फैसला RTE एक्ट की व्याख्या और पुरानी नियुक्तियों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिज़वी की खंडपीठ ने रिट याचिका संख्या 4981 ऑफ 2026 पर सुनवाई करते हुए रेस्पॉन्डेंट्स को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। याचिकाकर्ता दो सप्ताह में जवाबी एफिडेविट दाखिल कर सकेंगे। कोर्ट ने मामले को 3 अगस्त 2026 को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
Report: Dileep Singh Raghuwanshi

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