आज एक सज्जन यह कह रहे थे कि हम क़िस्मत वाले हैं कि हम भारत में हैं जहाँ इतनी शांति से होली, रंगपंचमी रमजान सब मना रहे हैं। पर मुझे लगा - और आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है तो और लगा- कि यह क़िस्मत की बात है या इसकी कि भारत के संस्कार मनुस्मृति के हैं। क्योंकि यह चेतावनी मनु ने ही दी थी कि (मनुस्मृति अध्याय ३ श्लोक ५७):
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः।।
जिन कुल और घरों में अपूजित अर्थात् सत्कार को न प्राप्त हुई स्त्रियाँ शाप देती हैं वे कुल तथा गृहस्थ चारों ओर से नष्ट – भ्रष्ट हो जाते हैं।
तो जिस मुल्क में इन दिनों सबसे ज्यादा अशांति है, क्या उसके पीछे वही आहें हैं स्त्रियों की?
संयुक्त राष्ट्र के तथ्यान्वेषण मिशन ने पाया कि उस मुल्क में प्रदर्शनों के दौरान किए गए शासकीय अपराधों में न्यायेतर हत्याएं, अत्यधिक बल प्रयोग, मनमाने ढंग से कारावास, यातना, बलात्कार, जबरन गायब करना और लिंग के आधार पर उत्पीड़न शामिल हैं। इन उल्लंघनों का सबसे अधिक असर महिलाओं, बच्चों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ा। सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, जिसमें कम से कम 551 प्रदर्शनकारी मारे गए — जिनमें 49 महिलाएं और 68 बच्चे शामिल थे। अधिकांश मौतें असॉल्ट राइफलों से की गई फायरिंग के कारण हुईं।
नवंबर 2022 से शुरू होकर कई महीनों तक, ईरान के दर्जनों स्कूलों में हजारों छात्राओं को जहर दिए जाने की घटनाएं सामने आईं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने बताया कि पहली जहर की घटना 30 नवंबर 2022 को क़ुम शहर में हुई। इसके बाद ईरान के 20 प्रांतों में 91 स्कूलों में इसी तरह के हमले दर्ज किए गए। सैकड़ों छात्राओं को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और कई अभिभावकों ने डर के मारे अपनी बेटियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आरोप लगाया कि यह हमले अनिवार्य हिजाब के विरुद्ध विद्रोह करने वाली छात्राओं को दंडित करने के लिए किए गए।
अप्रैल 2024 में अधिकारियों ने "नूर प्लान" लागू किया, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर भारी सुरक्षा गश्त बढ़ाई गई। इस अभियान में महिला चालकों का पीछा करना, उनकी गाड़ियां जब्त करना, कारावास, कोड़े मारना और अन्य यातनाएं शामिल थीं। 1979 की क्रांति के बाद से वहाँ महिलाओं पर अनिवार्य हिजाब कानून लागू है, और इसके उल्लंघन पर हिरासत, कोड़े मारना और भारी जुर्माने की सजा दी जाती है। नए कानून में हिजाब न पहनने पर मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। हिरासत में बंद लोगों को जबरन गायब करने से लेकर एकांत कारावास, यातना और दुर्व्यवहार सब किया गया। सरकारी टेलीविजन पर यातना के तहत दिए गए "कबूलनामे" प्रसारित किए गए। कुछ राजनीतिक बंदियों को मनोरोग सुविधाओं में रखकर जबरन दवाएं दी गईं।
2022 के "वूमन, लाइफ, फ्रीडम" आंदोलन और 2019 के नवंबर विरोध प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के परिजनों को भी न्याय मांगने पर उत्पीड़न का शिकार बनाया गया। उस मुल्क ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाली अंतरराष्ट्रीय संधि CEDAW की पुष्टि करने से भी इनकार किया है।
उस मुल्क की कानूनी व्यवस्था में महिलाओं के साथ विवाह, विरासत, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी में व्यापक भेदभाव किया जाता है। वहाँ विवाह के नियम सबसे अधिक भेदभावपूर्ण हैं। एक पुरुष एक साथ चार पत्नियाँ रख सकता है, जबकि एक महिला केवल एक पति से विवाह कर सकती है। मुस्लिम महिला किसी गैर-मुस्लिम पुरुष से विवाह नहीं कर सकती, लेकिन मुस्लिम पुरुष यहूदी, ईसाई या पारसी महिला से विवाह कर सकता है।विवाह की आयु की परवाह किए बिना, किसी महिला को पहली बार विवाह करने के लिए अपने पिता या पितामह की सहमति आवश्यक होती है — चाहे वह कितनी भी उम्र की क्यों न हो। पुरुषों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
क्रांति के बाद सरकार ने लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 से घटाकर 13 (1979 में) और फिर 9 (1982 में) कर दी। 2002 में संसद ने इसे वापस 13 वर्ष किया। लड़कियाँ केवल 9 चंद्र वर्ष (लगभग 8 वर्ष 9 महीने) की आयु में कानूनी रूप से जिम्मेदार मानी जाती हैं, जबकि लड़कों के लिए यह आयु 15 चंद्र वर्ष है। सिविल संहिता की धारा 1133 कहती है: "एक पुरुष जब चाहे अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है।" पुरुष केवल मौखिक रूप से, यहाँ तक कि पत्नी की अनुपस्थिति में भी, तलाक घोषित कर सकता है। महिला को तलाक के लिए केवल अदालत में जाना होता है। तलाक के लिए महिला को साबित करना होता है कि उसके पति ने आवास, भोजन या स्वास्थ्य सेवा जैसी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं — साथ ही यह भी कि उसने खुद अपने "वैवाहिक कर्तव्य" जैसे आज्ञाकारिता और यौन संबंध के अधिकार पूरे किए।
यदि कोई महिला तलाक लेना चाहती है लेकिन पति की सहमति या अदालती आदेश नहीं मिल रहा, तो वह "खुला तलाक" ले सकती है — लेकिन इसके लिए उसे अपनी संपत्ति पति को सौंपनी होती है। पिता के पास बच्चों की एकमात्र कानूनी संरक्षकता होती है। माँ को संरक्षकता तभी मिल सकती है जब पिता की मृत्यु हो जाए और पितामह आपत्ति न करें। तलाक की स्थिति में माँ को 7 वर्ष तक की आयु तक कस्टडी मिलती है, उसके बाद कस्टडी स्वतः पिता को चली जाती है। यदि माँ पुनर्विवाह कर लेती है, तो वह बच्चे की कस्टडी खो देती है — भले ही पहला पति मर चुका हो। इसके अलावा, बच्चे का पासपोर्ट बनवाने या सर्जरी कराने जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए भी पिता की अनुमति जरूरी है। धारा 1105 के अनुसार पति परिवार का मुखिया है।
पति अपनी पत्नी को किसी ऐसे पेशे में काम करने से रोक सकता है जिसे वह "पारिवारिक हितों के विरुद्ध" या परिवार के लिए अपमानजनक मानता हो।महिला को विदेश यात्रा या पासपोर्ट बनवाने के लिए अपने पति की सहमति आवश्यक है। इसका एकमात्र अपवाद तब है जब विवाह प्रमाण पत्र में यात्रा का अधिकार विशेष रूप से दर्ज हो।उत्तराधिकार में बेटी को बेटे की तुलना में आधी संपत्ति मिलती है। विधवा को पति की संपत्ति का केवल एक-आठवाँ हिस्सा मिलता है यदि उनके बच्चे हैं, और एक-चौथाई यदि बच्चे नहीं हैं। शेष संपत्ति पति के परिवार को मिलती है। किसी महिला की हत्या पर दी जाने वाली क्षतिपूर्ति ("दियत") एक पुरुष की हत्या पर दी जाने वाली राशि की आधी होती है। यह राशि उस मुल्क के मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रतिवर्ष 100 ऊँटों के मूल्य के आधार पर निर्धारित की जाती है। केवल पुरुष ही "अस्थायी विवाह" का दावा कर सकते हैं और इस प्रकार व्यभिचार के आरोप से बच सकते हैं।
महिलाओं को यह समान अधिकार प्राप्त नहीं है। 2021 में एक कानून लाया गया जिसने गर्भपात और गर्भनिरोधक उपायों को अपराध घोषित कर दिया, जिससे महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और कम हो गई। 1979 की क्रांति के बाद महिलाओं को न्यायाधीश के पद से हटा दिया गया। महिलाएं सर्वोच्च नेता, राष्ट्रपति या न्यायपालिका प्रमुख नहीं बन सकतीं। महिला अपनी नागरिकता अपने बच्चों को नहीं दे सकती — नागरिकता केवल पिता की ओर से मिलती है। यदि एक महिला विदेशी नागरिक से विवाह करती है, तो उसकी अपनी नागरिकता भी खतरे में पड़ सकती है।
जब महिलाओं के साथ इतना कुछ दमन हो रहा हो तब तबाही आनी ही थी।
मनु ये चेतावनी बहुत पहले दे चुके थे
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्। तस्यां त्वरोचमानायां सर्वं एव न रोचते।।
कि स्त्री के प्रसन्न रहने से सब कुल प्रसन्न रहता है और स्त्री के अप्रसन्न रहने से सब कुल अप्रसन्न रहता है।
मुझे वाल्मीकि रामायण का वह प्रसंग याद आता है जब रावण मरा पड़ा है और मंदोदरी अपने पति की मृत्यु का शोक करते हुए कह रही है कि पतिव्रताओं के आँसू व्यर्थ नहीं गिरते हैं। रावण ने सीता सहित हजारों स्त्रियों पर अत्याचार ही किये थे।
यह ठीक है कि नवउपनिवेशवाद की अपनी क्रूरताएँ हैं और वह भी उस दंड से वंचित नहीं रहेगा जिसमें एक मनोविकृत अभिजात अल्पवयस्कों पर तमाम किस्म के अत्याचार करता रहा, पर ऊपर गिनाई चीजों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मनु की सांस्कृतिकी को बदनाम करने वाले क्रमशः फाश होते चले जायेंगे।
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड ऑफिसर हैं।

