बिज़नस न्यूज़ डिपार्मेंट, 15 मार्च 2026 : भारत में कंपनियां अपनी पॉलिसी को, ग्राहकों के सामने सरकारी नियमों की तरह प्रस्तुत करती हैं और ग्राहक भी कंपनी की पॉलिसी का सरकार के नियम की तरह पालन करते हैं। लेकिन अमेरिका में Adobe जैसी दिग्गज आईटी कंपनी को 625 करोड़ का भुगतान करना पड़ेगा क्योंकि उसने यूजर्स के साथ थोड़ी सी आंख आंख मिचोली कर ली थी।
Adobe to Pay Rs 625 Crore After Allegations of Tricking Users
तो बात ऐसी है कि जून 2024 में एक यूजर ने Adobe के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था। यूजर का कहना था कि कंपनी ने Annual Paid Monthly प्लान की महत्वपूर्ण शर्तों को छिपाकर और सब्सक्रिप्शन रद्द करने की प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल और कठिन बनाकर उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का उल्लंघन किया है। हमारे यहां पूरा शेयर मार्केट और इंश्योरेंस मार्केट प्लान की महत्वपूर्ण शर्तों को छिपाकर और रद्द करने की प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल और कठिन बनाकर ही चल रहा है। इसके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं होती क्योंकि ऐसी किसी शिकायत का प्रावधान ही नहीं है। यदि किसी इंश्योरेंस पॉलिसी में उसकी नियम और शर्तों के बारे में बहुत छोटे फ़ॉन्ट में लिखा हुआ है जिसे चश्मा लगाने वाला व्यक्ति पढ़ ही नहीं सकता तो वह इसके खिलाफ शिकायत भी नहीं कर सकता। क्योंकि प्रावधान ही नहीं है।
The CEO resigned over a consumer dispute
लेकिन अमेरिका में ऐसा प्रावधान है और अमेरिकी न्याय विभाग में इस मामले की सुनवाई की गई। मुकदमे की सुनवाई के दौरान यह भी साबित हुआ कि ग्राहकों को कैंसिलेशन फीस के बारे में जानकारी तब मिलती थी जब वह अपना सब्सक्रिप्शन कैंसिल करने का ऑर्डर दे चुके होते थे। एक ग्राहक द्वारा की गई शिकायत का प्रभाव इतना ज्यादा रहा की 18 साल के सफल कार्यकाल के बाद कंपनी के सीईओ शांतनु नारायण को अपना पद छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी। यहां याद दिला देंकि शांतनु नारायण ने ही लाइफटाइम लाइसेंसिंग वाले सिस्टम को छोड़कर Subscription-Only वाला मॉडल लॉन्च किया था।
As the public stands united for its rights
न्याय विभाग में मुकदमे के दौरान जब लोगों को यह पता चला कि Adobe कंपनी अपने ग्राहकों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है तो कंपनी को सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। कंपनी की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ा। यहां तक की कंपनी के सफल सीईओ को अपना पद छोड़ना पड़ा। अब कंपनी ने इस मुकदमे को खत्म करने के लिए 625 करोड़ का भुगतान करने की पेशकश की है। न्याय विभाग ने मंजूरी दे दी है और उपभोक्ता भी मान गए हैं।
मोरल ऑफ द न्यूज़ स्टोरी
भारत में जिन परेशानियों को सामाजिक समस्या या "ऐसा ही होता है" मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। अमेरिका में उनके खिलाफ कानूनी लड़ाई के प्रावधान है। भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून इतने कमजोर हैं कि इस तरह के मामले में सब्सक्रिप्शन फीस की वापसी, ₹5000 कानूनी खर्च और ₹5000 जुर्माना देने का प्रावधान है जबकि अमेरिका में कंपनी की हैसियत के हिसाब से जुर्माना का निर्धारण किया जाता है। पेनल्टी इतनी होती है कि कंपनी को भुगतान करने में समस्या आए और पेनल्टी से बचने के लिए वह दोबारा गलती ना करें। यदि भारत में जनता ऐसे मुद्दों पर बात करेगी, तो भारत की सरकार भी ऐसे कानून बनाएगी।

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