ग्रामोदय से राष्ट्रोदय की संकल्पना को साकार करने वाले राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख - 27 फरवरी पुण्यतिथि पर विशेष

Updesh Awasthee
सुरेन्द्र शर्मा / 
"मेरा जीवन अपने लिए नहीं अपनों के लिए है अपने वे हैं जो दुःखी शोषित और पीड़ित हैं। नानाजी देशमुख के यह वाक्य केवल उनके ही जीवन का ध्येय वाक्य नहीं था बल्कि उनके पदचिन्हों पर चलकर हजारों लोगों ने मानवता की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया जिसका परिणाम आज चित्रकूट गोंडा और अन्य जिलों में देखा जा सकता है।।"

Nanaji Deshmukh Death Anniversary: Remembering a Visionary Social Reformer

नानाजी देशमुख का नाम भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक ऐसे कर्मयोगी के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने राजनीति को समाजसेवा का माध्यम बनाया और बाद में सक्रिय राजनीति छोड़कर पूर्णकालिक ग्रामोदय के कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया। उनका जीवन सादगी, राष्ट्रभक्ति, संगठन कौशल और ग्राम विकास की प्रयोगधर्मिता का अद्भुत संगम था। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी समाज सुधारक और चिंतक थे।

नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभणी जिले के कडोली गांव में हुआ। उनका वास्तविक नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। बाल्यकाल से ही वे परिश्रमी, आत्मनिर्भर और राष्ट्रभावना से ओत-प्रोत थे। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और युवावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। संघ के स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने संगठनात्मक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उत्तर प्रदेश में संघ के विस्तार में विशेष योगदान दिया।

नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने के लिए निरंतर परिश्रम किया। वे उत्तर प्रदेश में जनसंघ के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते थे। उनकी कुशल रणनीति के कारण 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिली और कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं।

1975 में जब देश में आपातकाल लगाया गया, तब नानाजी देशमुख लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय रहे। उन्होंने भूमिगत रहकर विरोध आंदोलन को संगठित किया। आपातकाल के विरुद्ध जनांदोलन में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। बाद में वे जनता पार्टी के गठन में भी सक्रिय रहे और 1977 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
सक्रिय राजनीति में ऊँचे पदों तक पहुँचने के बावजूद नानाजी देशमुख ने 60 वर्ष की आयु में राजनीति से संन्यास लेने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण समाज का पुनर्निर्माण है। उन्होंने स्वयं को ग्रामीण विकास के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।

नानाजी देशमुख ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ के सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया। उनके अनुसार विकास का केंद्र गांव होना चाहिए, क्योंकि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। इसी उद्देश्य से उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट क्षेत्र को अपने कार्यक्षेत्र के रूप में चुना।

नानाजी देशमुख और भारतीय जनसंघ

नानाजी देशमुख का नाम भारतीय जनसंघ के प्रमुख संगठनकर्ताओं और रणनीतिकारों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे उन नेताओं में थे जिन्होंने जनसंघ को जमीनी स्तर पर मजबूत किया और उसे एक वैकल्पिक राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में हुई थी। नानाजी देशमुख प्रारंभ से ही इस दल से जुड़े और संगठन विस्तार का दायित्व संभाला। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे थे, इसलिए संगठन निर्माण और कार्यकर्ता तैयार करने में उनकी विशेष दक्षता थी।

उत्तर प्रदेश में जनसंघ को मजबूत बनाने का श्रेय मुख्यतः नानाजी देशमुख को जाता है। उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा किया। उनकी रणनीति थी कि पहले मजबूत संगठन बनाया जाए, फिर चुनावी सफलता स्वतः मिलेगी।

नानाजी देशमुख का राजनीतिक दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक था। वे मानते थे कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष और राष्ट्र निर्माण का साधन है।

1967 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कड़ी चुनौती देने में उनकी रणनीति महत्वपूर्ण रही। उस समय गैर-कांग्रेसी दलों को एकजुट करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं।

वे पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूत करने में विश्वास रखते थे। व्यक्तिगत प्रचार से दूर रहकर उन्होंने पार्टी के लिए कार्यकर्ता-आधारित संरचना विकसित की।

नानाजी देशमुख  पंडित दीनदयाल उपाध्याय के “एकात्म मानव दर्शन ” से अत्यंत प्रभावित थे। जनसंघ की नीतियों में इस विचारधारा को स्थापित करने में उनका योगदान रहा वे मानते थे कि भारतीय राजनीति को पश्चिमी विचारधाराओं की नकल करने के बजाय भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। जनसंघ के कार्यक्रमों और नीतियों में राष्ट्रीयता, स्वदेशी और सामाजिक समरसता पर जोर देने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

1975 में जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तब जनसंघ के अनेक नेता गिरफ्तार किए गए। नानाजी देशमुख ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। वे भूमिगत रहकर आंदोलन को संगठित करते रहे।

आपातकाल के विरोध में जनसंघ और अन्य विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने के प्रयासों में भी उनका योगदान रहा। 1977 में जनता पार्टी के गठन में जनसंघ का विलय हुआ और उस ऐतिहासिक परिवर्तन में नानाजी देशमुख की रणनीतिक भूमिका मानी जाती है।

जनसंघ और बाद में जनता पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान रखने के बावजूद नानाजी देशमुख ने 60 वर्ष की आयु में सक्रिय राजनीति छोड़ दी। उनका मानना था कि नए नेतृत्व को आगे आना चाहिए और वे स्वयं समाजसेवा के कार्यों में लग गए। यह निर्णय उनकी त्यागमयी प्रवृत्ति और आदर्शवादी सोच का प्रमाण था। उन्होंने सिद्ध किया कि उनके लिए पद या सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र और समाज की सेवा है।

नानाजी देशमुख और भारतीय जनसंघ का संबंध केवल एक नेता और दल का नहीं था, बल्कि वह एक वैचारिक और संगठनात्मक साझेदारी थी। उन्होंने जनसंघ को जमीनी स्तर पर मजबूत किया, कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया और वैकल्पिक राजनीति की नींव को सुदृढ़ बनाया। उनका योगदान भारतीय राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जनसंघ की संगठनात्मक शक्ति और वैचारिक स्पष्टता के पीछे नानाजी देशमुख जैसे समर्पित नेताओं का अथक परिश्रम था।

ग्राम विकास और नानाजी देशमुख 

नानाजी देशमुख भारतीय सार्वजनिक जीवन के ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने ग्राम विकास को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बना लिया। उनका विश्वास था कि “भारत की आत्मा गांवों में बसती है” और जब तक गांव आत्मनिर्भर, शिक्षित और समृद्ध नहीं होंगे, तब तक देश का समग्र विकास संभव नहीं है। राजनीति के उच्च शिखर पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर स्वयं को पूर्णतः ग्रामोदय (गांवों के समग्र विकास) के कार्य में समर्पित कर दिया।

नानाजी देशमुख ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट क्षेत्र को अपने ग्राम विकास कार्यों की प्रयोगभूमि बनाया। यह क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़ा, सूखा प्रभावित और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था। उन्होंने यहां के लगभग 500 गांवों को विकसित करने का लक्ष्य रखा।

उन्होंने 1968 में स्थापित दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से समग्र ग्राम विकास की योजना लागू की। इस संस्थान का उद्देश्य था—गांवों को आत्मनिर्भर, शिक्षित, स्वस्थ और संगठित बनाना।

नानाजी देशमुख ने ग्राम विकास को केवल आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने “समग्र ग्राम विकास” का मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें पांच प्रमुख आयाम थे-
 शिक्षा, स्वास्थ्य,स्वावलंबन (रोजगार),सामाजिक समरसता
,सतत कृषि और जल संरक्षण
उनका मानना था कि यदि इन सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्य किया जाए, तभी स्थायी परिवर्तन संभव है।
नानाजी देशमुख का विश्वास था कि शिक्षा ही विकास की कुंजी है। उन्होंने चित्रकूट में विद्यालयों, बाल संस्कार केंद्रों और तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना की ग्रामीण बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की गई।
युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए गए 
कृषि, कुटीर उद्योग और लघु व्यवसायों से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने शिक्षा को रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया ताकि पढ़ाई के बाद युवाओं को गांव छोड़कर शहर न जाना पड़े।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को दूर करने के लिए नानाजी देशमुख ने स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए।
गांवों में नियमित स्वास्थ्य शिविर लगाए गए।मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया गया।आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा दिया गया।
स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के माध्यम से स्वच्छता, पोषण और टीकाकरण के महत्व को समझाया गया।
नानाजी देशमुख ने किसानों को आधुनिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों से परिचित कराया।
जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन की तकनीकों को अपनाया गया जैविक खेती को प्रोत्साहित किया गया ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे।
पशुपालन और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा दिया गया।
उन्होंने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि आधारित लघु उद्योगों की स्थापना में मदद की। इससे गांवों की आय में वृद्धि हुई और रोजगार के अवसर बढ़े।
ग्राम विकास में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए नानाजी देशमुख ने महिला समूहों को संगठित किया।
स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) बनाए गए।
महिलाओं को सिलाई, बुनाई, खाद्य प्रसंस्करण जैसे कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया।आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान किए गए।
इससे महिलाओं की सामाजिक स्थिति मजबूत हुई और परिवार की आय में भी वृद्धि हुई।
नानाजी देशमुख जातिगत और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध थे। उन्होंने गांवों में सामाजिक समरसता स्थापित करने का प्रयास किया ग्राम सभाओं को सक्रिय किया गया।
सामूहिक निर्णय प्रणाली को बढ़ावा दिया गया।
आपसी विवादों का समाधान गांव स्तर पर ही करने की परंपरा विकसित की गई।
उनका उद्देश्य था कि गांव के लोग मिलकर अपने विकास का मार्ग स्वयं तय करें।
नानाजी देशमुख का मुख्य लक्ष्य था—“स्वावलंबी गांव”। वे मानते थे कि सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के बजाय गांवों को अपने संसाधनों का सही उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने स्थानीय संसाधनों के आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया, जैसे— हस्तशिल्प
खाद्य प्रसंस्करण,लघु उत्पादन इकाइयाँ।इससे गांवों में रोजगार के अवसर बढ़े और पलायन में कमी आई।
नानाजी देशमुख का विश्वास था कि “ग्रामोदय से राष्ट्रोदय” संभव है। अर्थात जब गांव विकसित होंगे, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। उनका मॉडल आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का प्रारंभिक रूप कहा जा सकता है।
चित्रकूट में उनके प्रयासों से कई गांव ऐसे बने जहां बेरोजगारी कम हुई,शिक्षा का स्तर बढ़ा,
स्वास्थ्य सेवाएं सुधरीं, सामाजिक एकता मजबूत हुई
उनका यह प्रयोग आज भी ग्रामीण विकास के एक सफल मॉडल के रूप में जाना जाता है।
नानाजी देशमुख का ग्राम विकास मॉडल केवल योजनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक जीवनदृष्टि थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि नेतृत्व ईमानदार और दूरदर्शी हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े परिवर्तन संभव हैं।
आज भी चित्रकूट क्षेत्र में उनके द्वारा शुरू की गई योजनाएं चल रही हैं और हजारों लोग उनसे लाभान्वित हो रहे हैं। उनका कार्य यह दर्शाता है कि विकास का सही मार्ग नीचे से ऊपर की ओर जाता है।
नानाजी युवाओं को संबोधित करते हुये अक्सर कहते थे अपने गांव को छोड़कर भागो मत उसे बदलने का संकल्प लो,वह युवाओं से कहते थे स्वावलंबन ही आत्म सम्मान की नींव है देश बदलना है तो पहले समाज को बदलो ,समाज बदलना है तो पहले स्वयं को बदलो"
 ♦चित्रकूट एवं आसपास के 50 गांवों में स्वावलंबन अव समरसता की अलख जगाने वाले कर्मयोगी नानाजी देशमुख 27 फरवरी 2010को सदैव के लिए चिर निद्रा में लीन हो गए।
नानाजी के निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने कहा कि नानाजी जी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित किया।
ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा।।
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने नानाजी देशमुख को संगठन का आधार स्तंभ और त्याग की प्रतिमूर्ति बताया।
अटल जी ने कहा कि नानाजी ने सत्ता से ऊपर उठकर समाज सेवा को चुना जो उनके महान व्यक्तित्व को दर्शाता है।
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने नानाजी देशमुख को "राष्ट्र ऋषि" की संज्ञा देते हुए कहा कि नानाजी का जीवन सादगी ,सेवा और समर्पण का प्रतीक था। ग्रामोदय के क्षेत्र में उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्श होगा।।
♦वर्ष 2019 में नानाजी को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किया ।
यह सम्मान उनके द्वारा किए गए आजीवन समाजसेवा,ग्रामीण विकास,राष्ट्र निर्माण और सार्वजनिक जीवन में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया।।
नानाजी  देशमुख भारत माता के सच्चे सपूत थे जिन्होंने भारत माता की सेवा में जीवन समर्पित कर दिया मृत्यु के पश्चात भी उनकी इच्छानुसार उनका देहदान दिल्ली एम्स को किया गया।
वह सच्चे अर्थों में "भारत रत्न" थे भारत माता के ऐसे रत्न जिसकी चमक आने वाली कई शताब्दी की पीढ़ियों को राह दिखाती रहेगी।।
सुरेन्द्र शर्मा, प्रदेश उपाध्यक्ष, भाजपा मध्यप्रदेश
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