वे लोग जो हिन्दुओं की वर्णव्यवस्था को शोषणमूलक बता रहे थे, एपस्टीन से पता करें कि असल शोषण क्या होता है और कैसे किया जाता है। हावर्ड यूनिवर्सिटी इकतरफ़ा हिन्दू बैशिंग में लगी रही थी, देखिए भारत की जाति व्यवस्था का कुप्रचार करने वाले लोग यहाँ किस तरह के भोग में लगे थे। उनके नाम मैं नहीं गिनाना चाहता पर ये वे लोग थे जो बाहर भारत को प्रवचन दिया करते थे और अंदरखाने इनके कर्म इतने भयावह थे। MIT की मीडिया लैब एप्स्टीन से डोनेशन प्राप्त कर रही थी। हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोग्राम फॉर ईवोल्यूनरी डायनेमिक्स को भी एप्स्टीन का डोनेशन मिला था। रॉकफेलर विश्वविद्यालय को भी।
हे समता के ठेकेदारो, पहले अपनी गिरेबान में झाँको
और जब ये सब दो दशकों से चल रहा था अमेरिकी विश्वविद्यालयों की वे ईक्वलिटी लैब्स क्या कर रही थीं। वे भारत की जाति को अपने नस्लवाद के जैसा बताने में सारी माथापच्ची करती रही थीं? वो कौन था जिसने कहा था, Physician, heal thyself. पर किसी ने इन्हें नहीं कहा कि हे समता के ठेकेदारो, पहले अपनी गिरेबान में झाँको।
क्या ऐसा नहीं लगता कि ये, वे लोग हैं जो अकाउंटेबिलिटी की सामान्य संरचनाओं की परवाह नहीं पालते थे। प्राइवेट जेट है, अपना द्वीप है, अपनी लीगल टीमें हैं तो मासूमों पर इतना जुल्म भी न कर पायेंगे क्या? उन्हें सांस्थानिक पकड़ ( institutional capture) का गर्व रहा होगा। उन्हें नेटवर्क प्रोटेक्शन की आश्वस्ति रही होगी।
क्या क्रांति से पहले का फ्रांस याद आता है?
उस समय की नोबिलिटी की अधमता ऐसी थी। लेकिन इस बार वामी क्रांतिवीर भी इसमें फँसे पड़े थे। अब इस तरह का सीधा शिकारीकरण (डायरेक्ट विक्टिमाइजेशन) जो एप्स्टीन कांड में देखने में आया, पॉल कोर्टराइट उसका मनोविश्लेषण करेंगे कि अपनी डेढ़ छटाँक की बुद्धि गणेश और पार्वती के बीच ईडीपस कॉम्प्लेक्स ढूंढने में ही व्यर्थ करते रहेंगे। एलन मस्क सांता के paedophilia पर बात करते थे कि वह बच्चों से ही क्यों मिलता है, रात को ही क्यों आता है, चोरों की तरह चिमनी से ही क्यों उतरता है पर अब वास्तविक सांताओं को देखिए कि जो एक हाथ से डोनेशन देते हैं और दूसरे हाथ से नये नये वायरस दुनिया में फैलाते हैं और paedophile तो खैर हैं ही, शिशु माँस भी खाते हैं।
धन का त्रुटिपूर्ण संचय एक बात है पर ऐसा अमानुषिक संचय! कि जितना ज्यादा कलुषित पैसा होता जाता है, उतना बड़ा immunity bubble तैयार होता जाता है। प्राइवेट जेट आपको एयरपोर्ट सीक्योरिटी से मुक्त करते हैं तो अपना प्राइवेट द्वीप आपको पड़ोसी ताक झांक से मुक्त करता है। डॉ नो के विलेन का भी ऐसा ही क्रैब की नामक प्राइवेट द्वीप था जहाँ से वह अपने हाई-टेक ईविल ऑपरेशन्स चलाता है। द मैन विद द गोल्डन गन में फ्रांसिस्को स्कारामांगा नामक महा-आधुनिक विलेन ऐसे ही अपने निजी द्वीप में रहता है। स्काईफॉल में राउल सिल्वा नामक खलनायक ने अपने द्वीप को एक किले में बदल दिया है। हमारा मोगांबो क्या था? या शाकाल? या शालीमार? यह अलग द्वीप ही इस मनोविज्ञान को व्यक्त करता है कि सम्बंधित खलपात्र सामाजिक मानदंडों से एक तरह की रिट्रीट माँग रहा है। फ्रायड की भाषा में कहें तो उसका ईगो (अहं) उसके सुपरईगो (पराहं) के नियंत्रण से छुटकारा चाहता है तो अपनी एक अलग ही दुनिया बना लेता है। एप्स्टीन का यह द्वीप लिटिल सेंट जेम्स ही कुछ ऐसा ही था। लिटिल सेंट - शायद उस paedophilia का ही प्रतीक रहा होगा। पता नहीं ये पश्चिमी लोग किन चीजों में सेंटहुड ढूँढते हैं। इनका नरसंहारक ज़ेवियर भी सेंट हो गया था।रावण की लंका भी ऐसी ही द्वीप रही होगी। और एपस्टीन के लिटिल सेंट जेम्स में आते भी वही लोग थे जो गॉड काम्प्लेक्स से भरे हुए थे। वह द्वीप उनकी एकान्त स्वायत्तता का ही प्रतीक था। एक नैतिक निर्वात रचता हुआ।
देखा जाए तो सांसारिक जीवन कोई बहुत साफ सुथरा नहीं है। हरेक के अपने अपने गढ्ढे हैं। लेकिन हैं वे गर्त ही, वे द्वीप नहीं हैं।
एपस्टीन का वह द्वीप कोई छिपने की जगह नहीं थी, वह तो एक मंच था जहाँ से अभिजात अपनी ताकत, अपनी प्रभुसत्ता, अपनी आर्थिक प्रतिष्ठा की हाई पिच हाई वॉल्यूम की घोषणा करता है। इसमें ‘अँधेरे में’ निकलते हुए जुलूस की तरह सब शामिल हैं। दार्शनिक, विचारक, वैज्ञानिक सब। एप्स्टीन डोमाजी उस्ताद है मुक्तिबोध का। उसके रिक्रूटर्स थे जो ऐसी कमसिन बच्चियों को फाँस लाते थे जिनके पास पलटकर लड़ने के साधन ही नहीं हों।बल्कि यह तक था कि जैसे इनके यहाँ डाग फैक्ट्री होती हैं जिसमें पिल्लों का असेंबली लाइन उत्पादन होता है, वैसी तैयारी बच्चों बच्चियों के लिए थी।सेक्स ट्वायस की तरह उनका इस्तेमाल करने की।
और उसकी न्यायप्रणाली उसे तेरह माह से अधिक की सजा नहीं दे पाई थी। वह भी एक plea deal थी और काउंटी जेल की।
जिमी सेवाइल, हार्वे विंस्टीन, NXIVM जैसे कितने ही प्रकरण उस मुल्क की सिस्टम्स के संकेत देते हैं। ये वे लोग हैं जो करुणा-कांड रचते हैं। दया-दान इनका कवच नहीं, इनका अस्त्र है।
चूँकि खुद कीचड़ में गले गले धँसे हुए हैं, इसलिए हिन्दुत्व की डिस्मैंटलिंग के वास्ते कीचड़ ही उछालते रहते हैं।
मनोविज्ञान उसे transference की defence mechanism कहेगा पर रणनीतिकार कहेगा कि offence is the best defence.
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं।

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