मनुस्मृति के समय तक न बाइबिल थी न कुरान। लेकिन बाद में भी जब ये ग्रंथ आये तो भी उनमें उतना विकसित न्याय-विमर्श नहीं मिलता है। संभवतः इसका कारण यह रहा हो कि इन ग्रंथों का लक्ष्य या प्रयोजन वैसा न रहा हो जैसा मनुस्मृति का था। किन्तु फिर उन दावों का क्या जो Cornelius Van Til जैसे कई लोग करते हैं कि The Bible is authoritative on everything of which it speaks. Moreover, it speaks of everything. अल गज़ाली और सईद नरसी भी ऐसा ही कुरआन के बारे में दावा करते थे। तब तो इन्हें न्याय दान की भी वैसी ही विशद चर्चा करनी चाहिए थी। पर नहीं की। पर जो है, उसकी चर्चा कर लें:
ईशनिंदा ( blasphemy) के अपराध को ही ले लें। बाइबिल में Leviticus ( 24:16) में कहा गया कि Whoever blasphemes the name of the Lord shall surely be put to death. All the congregation shall stone him. मनुस्मृति इसे अपराध ही नहीं मानती। कुछ लोगों का कहना है कि “संक्रममध्यवजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदक:/ प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पंच दद्याच्छतानि च।” (नवम अध्याय) के श्लोक में प्रतिमा को तोड़ने पर दंड है। पर यहाँ देवप्रतिमा की बात नहीं है। दूसरे, यह प्रतिमा नहीं है, प्रतिमान है जिसका अर्थ है तराजू का बाँट। तीसरे यहाँ दंड भी सिर्फ यह है कि उन्हें उनसे फिर से बनवा लिया जाए। या जिसका जितना ऐश्वर्य है, उसके अनुसार दंड दें। कम पैसे वाले को पाँच सौ पैसा, ज्यादा वाले को पाँच सौ रुपया और बहुत धनाढ्य को पाँच सौ अशर्फ़ी।
मनुस्मृति ईशनिंदा की जगह वेदनिंदा को ज्यादा गंभीरता से लेती है। पर तब भी दंड उस अपराधी को नास्तिक कहकर बहिष्कृत करना है, पत्थरों से मार डालना नहीं। वेदों का उपहास सुरापान जितना महापातक माना गया है पर उसका दंड नहीं बताया गया।
उधर नये टेस्टामेंट के अनुसार लगता है जिसमें ऐसा करने वाले को हमेशा नरक में रहना है। कुछ लोग यह कहते हैं कि ‘नया विधान’ सिर्फ नैतिक निंदा करता है किन्तु अधिकतर विद्वान यह कहते हैं कि नया विधान पुराने को सुपरसीड नहीं करता। इसलिए वहाँ एक अतिरिक्त परत जोड़ी गई है, पर कहीं पुरानी परत को खत्म करने के निर्देश नहीं हैं। इंग्लिश कॉमन लॉ में इसलिए यह अपराध बना रहा और अभी 2008 में हटाया गया, आयरलैंड में 2020 में, स्कॉटलैंड में 2021 में। इटली के क़ानूनों में आज तक यह अपराध है। 17 वीं सदी तक कई यूरोपीय देशों में यह अपराध रहा और संयुक्त राज्य अमेरिका में अभी बीसवीं सदी के आरंभ तक यह एक निषिद्ध चीज थी।
थामस जेफरसन को लिखे एक पत्र में जॉन एडम्स ने बताया था कि “पूरे ईसाई जगत में एक ऐसा कानून मौजूद है, जो पुराने और नए नियम की सभी पुस्तकों (Genesis से लेकर revelations तक) की प्रेरणा का आसमानी होना नकारने या उस पर संदेह करने को ईशनिंदा घोषित करता है। यूरोप के अधिकांश देशों में इसे आग पर भूनने, रैक या चाक पर सजा दी जाती है। इंग्लैंड में भी, जीभ को लाल-गर्म तवे से छेदने की सजा दी जाती है। (There exists, I believe, throughout the whole Christian world, a law which makes it blasphemy to deny, or to doubt the divine inspiration of all the books of the Old and New Testaments, from Genesis to Revelations. In most countries of Europe it is punished by fire at the stake, or the rack, or the wheel. In England itself, it is punished by boring through the tongue with a red-hot poker.)
और यूरोप में एक समय यह ईशनिंदा सिर्फ गॉड या जीसस तक ही सीमित नहीं रही थी। यदि किसी सेंट की कब्र को काँटों से सजा दिया जाए तब भी ईशनिंदा मानकर उसकी सजा हुई थी। यदि किसी किसान स्त्री ने किसी सेंट की वेदी को नुकसान पहुंचाया तो भी यही हुआ। यदि किसी चर्च की वेदी के कपड़े फाड़ दिये तो भी। किसी सेंट की मूर्ति से तलवार हटा ली तो भी। यदि चर्च के धार्मिक समारोह में छींक दिया या खाँस दिया तो भी।
इसकी तुलना में कुरान कुछ अधिक उदारवादी है। उसके सूरा 73:10 में कहा गया कि: ‘वे जो कहते हैं उस पर सब्र रखो और वहाँ से शिष्टता के साथ हट जाओ’ और सूरा 50:39 में भी इसी सब्र की बात कही गई है। सूरा 3:186 में भी विरोधियों की निंदा से विचलित न होकर, धैर्य और ईश्वर-भय (तक़वा) अपनाने की सलाह दी गई है। क़ुरआन तो यह कहती है कि: “और उन लोगों को बुरा-भला न कहो जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकारते (पूजते) हैं, कहीं ऐसा न हो कि वे सीमा लांघकर अज्ञानतावश अल्लाह को बुरा-भला कहने लगें। इस प्रकार हमने हर समुदाय के लिए उनके कर्मों को आकर्षक बना दिया है; फिर उन्हें अपने रब की ओर ही लौटना है, तब वह उन्हें बता देगा जो कुछ वे करते रहे थे"।( 6:108) यह बात सूरा 4: 140 में भी आती है कि "और अल्लाह ने किताब (कुरान) में तुम पर यह हुक्म उतारा है कि जब तुम सुनो कि अल्लाह की आयतों का इनकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तो उनके साथ मत बैठो जब तक कि वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ; वरना तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओगे।” सूरा 6:68 पुन: कहता है कि “और जब तुम उन लोगों को देखो जो हमारी आयतों के बारे में (व्यर्थ) बातें करते हैं, तो उनसे दूर रहो जब तक कि वे किसी और बात में न लग जाएं। और यदि शैतान तुम्हें (यह बात) भुला दे, तो याद आने के बाद (उन) जालिमों के साथ न बैठो।"
ध्यान दें कि यह exit strategy शिव पुराण में भी बताई गई है कि उसमें भी शिव निंदा जहाँ हो रही हो, उसे न सुनने और उस स्थान से हट जाने के ऐसे ही निर्देश हैं। दक्ष प्रसंग में सती अपने पिता द्वारा शिव-निंदा किये जाने पर आत्माहुति दे देती हैं।
अब यह दिलचस्प है कि हदीसें इस मामले में क़ुरआन से विपरीत रुख अपनाती हैं। वहाँ इसे रिदा से जोड़ दिया गया है। उन्हीं के आधार पर मुस्लिम देशों में ईशनिंदा के खिलाफ मृत्युदंड का प्रावधान है। शरिया अदालतों में यह मामला निर्णीत होता है। हालाँकि आजकल तो यह काम निजी लोगों और संगठनों ने भी अपने हाथ में ले लिया है। तो कोई भी सर तन से जुदा करने निकल जाता है। यह सब क़ुरआन के पवित्र संदेश के उल्लंघन में है। लेकिन ईशनिंदा के अंतर्गत सिर्फ ईश्वर की ही बात नहीं रह गई है बल्कि उसमें पैगंबर हज़रत मोहम्मद की निंदा भी शामिल है और उसे निंदा होना भी जरूरी नहीं है। हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में एक प्रोफेसर ने जब यह कहा कि वे जब पैदा हुए तब मुसलमान नहीं थे क्योंकि तब तक क़ुरआन उन पर नाज़िल नहीं हुई थी। उसे ईशनिंदा माना जाकर उन्हें सजा-ए-मौत हुई। तुर्किए में एक संगीतकार सेजेन आक्सू ने आदम और हौवा को अपने गीत में अज्ञानी कह दिया तो उसे ईशनिंदा माना गया। स्पोटिफाइ ने God’s ringtones बनाईं तो वह ईशनिंदा हो गई। 2022 में पाकिस्तान में QR कोड को ही ईशनिंदा समझ कर भीड़ ने हमला कर दिया। मई 2022 में नाइजीरिया में एक लड़की को उसी की कक्षा के साथियों ने ईशनिंदा की लिंचिंग में मार डाला क्योंकि उसने व्हाट्सएप ग्रुप में एक संदेश शेयर किया जो वस्तुतः कोई ईशनिंदा नहीं था पर ऐसा समझा गया। 2015 में मलेशिया में पेराक में एक व्यक्ति द्वारा क़ुरआन की किसी पंक्ति का अर्थ पूछना ईशनिंदा माना गया।
युद्ध हो गये ईशनिंदा की इस सब्जेक्टिव समझ पर। यदि बाइजैंटाइन या सासानिद साम्राज्यों ने खिरद भेजने का संदेश न माना तो उसे ईशनिंदा माना गया। क्रूसेड्स हो गये। स्पेन का गृह युद्ध इसी कारण हुआ।
2019 तक विश्व के 40 फ़ीसदी देशों में ईशनिंदा कानून था। पर मनु के यहाँ नहीं है। इस हद तक कि हिन्दुत्व के विरुद्ध हर तरह का पूर्वाग्रह रखने वाली विकिपीडिया भी blasphemy पर जब हिन्दुत्व में कुछ ढूँढ नहीं सका तो उसने इस चर्चा में हिन्दुत्व का नाम ही ग़ायब कर दिया। जबकि बुद्धिज्म पर उसने इसी प्रविष्टि में उसने कहा कि उसमें ईशनिंदा नहीं है। वेंडी डोनिगर तक यह मानने को विवश हुईं कि प्राचीन भारत में ईश्वर को अपवचन (profane speech against God) पर दंड की अवधारणा थी ही नहीं। मनु अवतारों की या संतों की कथित अवहेलना या अवमान को भी ईशनिंदा या अपराध के रूप में वर्णित नहीं करते।
संभवतः इसकी कुछ साभ्यतिक लागतें भी रहीं जो अपनी अपार सहिष्णुता के कारण भारत ने भुगतीं। कई रिलीजन तो इसी चीज पर स्थापित हुए कि उन्हें देवी देवताओं का अपमान करना है। भीमयानियों ने वाकई प्रतिज्ञापूर्वक हिन्दू देवी देवताओं का नाम लेकर उनके विरुद्ध दुष्प्रचार अभियान चलाया। दिल्ली से निकलने वाली कुछ पत्रिकाएं लगातार राम और कृष्ण आदि अवतारों पर कुछ भी बकवास छापती रहीं पर उस पर भी वैचारिक असहमति से अधिक कुछ नहीं हुआ। कुछ विश्वविद्यालय परिसर दुर्गा को सेक्स वर्कर बताते रहे।
मनुस्मृति में क्षेपक की ही तरह सही, भृगु का नाम जुड़ा है जिन्होंने विष्णु जी की छाती पर लात मारी थी और विष्णु जी ने उनके पाँव पकड़ लिए थे कि कहीं वे उनकी कठोर छाती पर पड़ने से वे चोटिल तो नहीं हो गये थे। कहा हरि को घटि गयो जो भृगु मारी लात।
अब आप ही तय करें कि मनुस्मृति आधुनिक युग की स्पिरिट के ज्यादा नज़दीक हुई कि नहीं। समझना यह भी मुश्किल है कि यदि गॉड या अल्लाह या खुदा को ईश्वर कहने पर भी लोगों को आपत्ति हो जाती है तब ईशनिंदा का ईश शब्द भी उचित नहीं। मनुस्मृति ईशनिंदा या उसके किसी पर्याय का किसी अपराध की तरह न कोई उल्लेख नहीं करती है और न कोई दंड प्रस्तावित करती है।
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं।

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