मनोज श्रीवास्तव। मूर्तिपूजा पर मृत्युदंड देने वाला दंडविधान नहीं है और पूजा नहीं करने पर भी मृत्युदंड देने वाला विधान नहीं है। मृत्युदंड छोड़िये साधारण दंड भी मनु प्रस्तावित नहीं करते। दंड छोड़िए मनु तो निंदा-प्रशंसा तक नहीं करते। दरअसल मनु पूजा के प्रकारों पर बात ही नहीं करते। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि उनका ध्यान नैतिक गुणों के विकास और व्यवहार पर है।
बाइबिल में मूर्तिपूजा पर मृत्युदंड है
जबकि बाइबिल में मूर्तिपूजा पर मृत्युदंड है। सिर्फ वही नहीं यदि कोई अन्य देवों की सेवा करने के लिए प्रेरित करे तो भी पत्थर मारकर उसे और उसके परिवार वालों को मार डालना है। (Deuteronomy 13:6-10) कई बार मुझे लगता है कि वो ईशपुत्र किसी स्त्री की पत्थर मारकर हत्या करने पर पूछ रहे थे कि पहला पत्थर वही उठाये जिसने पाप नहीं किया हो; उनके जीवन में अन्य तरह की स्टोनिंग के ऐसे प्रसंग भी आये होंगे या नहीं ?
यही नहीं, बाइबिल का यह निर्देश भी है कि इज़राइल में कोई शहर मूर्तिपूजा में रत हो जाए तो उसे जलाकर नष्ट कर देना है। (Deuteronomy 13:15-16) याद कीजिए कि तुलसी ने किसके लिए कहा था कि ‘गाँव धेनु पुर आग लगावहिं।
और यह भी कि यदि कोई झूठा पैगंबर बनके मूर्तिपूजा की वकालत करते हुए लोगों को उसकी ओर प्रवृत्त करे तो उसे भी मार डालना है। (Deuteronomy 13:5)
और ऐसा करने से पहले जाँच करना है। जाँच में दो या तीन साक्षी होना चाहिए।
मूर्तिपूजा के प्रति यह घृणा परवर्ती मजहब ने उत्तराधिकार में प्राप्त की है। हालाँकि क़ुरआन को इस बात का श्रेय देना होगा कि उसने मूर्तिपूजा के विरुद्ध कम से कम इस संसार में कोई दंड प्रस्तावित नहीं किया। जो भी दंड है वह उसे ऑफ्टरलाइफ में अल्लाह के हाथों मिलना है पर यहाँ इस जीवन में नहीं। “निस्संदेह अल्लाह इस बात को क्षमा नहीं करता कि उसके साथ किसी को साझी ठहराया जाए, और इससे नीचे दर्जे के गुनाहों को जिसके लिए चाहे क्षमा कर देता है। और जिसने अल्लाह के साथ साझी ठहराया, तो उसने बहुत बड़ा गुनाह घड़ लिया।” 4:48 (सूरह अन-निसा, आयत 48) 4:116 (सूरह अन-निसा, आयत 116)
यह चीज़ यहाँ तक बढ़ती है कि : निश्चय ही उन लोगों ने कुफ्र किया जिन्होंने कहा कि अल्लाह मरियम का बेटा मसीह ही है। जबकि मसीह ने कहा था: “ऐ बनी इसराइल! अल्लाह की इबादत करो, जो मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी।” निस्संदेह जो कोई अल्लाह के साथ साझी ठहराएगा, तो अल्लाह ने उसके लिए जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है। और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं। कुरआन 5:72 (सूरह अल-माइदा, आयत 72) यह भी कि “और निश्चय ही तुम्हारी ओर और तुमसे पहले वालों की ओर भी वह्य (प्रकाशना) की गई है कि यदि तुमने शिर्क किया तो निश्चय तुम्हारे कर्म नष्ट हो जाएँगे और तुम नुकसान उठाने वालों में से हो जाओगे।” ( कुरआन 39:65 (सूरह अज़-ज़ुमर, आयत 65) यह भी कि “और (याद करो) जब लुक़मान ने अपने बेटे से नसीहत करते हुए कहा: “ऐ मेरे बेटे! अल्लाह के साथ किसी को साझी न ठहराना। निश्चय ही शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है।”
लेकिन जो बात ध्यान देने की है वह यह कि दंड देने का काम क़ुरआन ने मनुष्य या समाज पर नहीं छोड़ा है, अल्लाह को दिया है। सूरा 39:65 और 6:88 में यह कहा गया है कि शिर्क करने वाले के सारे पुण्य खत्म हो जाते हैं।
इसलिए क़ुरआन बाइबिल की तुलना में इस संदर्भ में अधिक सहिष्णु थी क्योंकि वह उस फ़ैसले को भी अल्लाह पर छोड़ती थी जिसके बारे में वह स्वयं सहमत नहीं थी।
फिर यह कैसे हुआ कि क़ुरआन के अनुयायियों ने क़ुरआन के इस महत्त्वपूर्ण प्रस्थान की उपेक्षा कर वही बात मान ली जो उनका स्थानीय प्रतिद्वन्द्वी रिलीजन कह रहा था। क्या यह संगत का असर था या इसका अर्थ यह था कि चूँकि स्वयं क़ुरआन में पैगंबर इब्राहिम को मूर्तियाँ तोड़ते हुए बताया गया है तो लोगों ने क़ुरआन के नाज़िल हुए सिद्धांत की जगह इब्राहिम के अनुकरण को बेहतर समझा?
पैगंबर मोहम्मद के द्वारा काबा की मूर्तियाँ तोड़ना भी हदीसों में और सीरा (जीवनी) में आता है, क़ुरआन में नहीं। क़ुरआन ने मूर्तियाँ तोड़ने का कोई जनरल आर्डर या कमांड नहीं दी थी, उसने अल्लाह पर भरोसा दिखाया था कि वह मूर्तिपूजकों को जन्नत में दाखिल नहीं करेगा और वे दोजख की आग में जलेंगे।
मूलतः यह बाइबिल के लिए आवश्यक यह था कि उनकी दशाज्ञाओं (टेन कमांडमेंट्स) में से प्रथम दो मूर्तिपूजा के विरोध पर आधारित हों।यह बात बीसवीं सदी के एक सज्जन की 22 प्रतिज्ञाओं की याद दिलाती है कि जिसमें से प्रथम आठ प्रतिज्ञाएँ हिन्दू देवी देवताओं और अवतारों और भगवानों के नाम गिनाते हुए उन्हें न मानने की ही हैं। यानी प्रतिक्रियात्मक है।
इन सबका प्रतिक्रियात्मक स्वरूप ही इनके परवर्ती होने का सबूत है। फिर भले कोई आदम से अपना आरंभ माने या मूलनिवासी होने का दावा करे। मूल सनातन ही था जो वास्तविक रूप से समावेशी और बहुवचनी था, जिसके दंड विधान में पूजापद्धति के आधार पर आपराधिक सजाएँ नहीं थीं।
पर क्या आपने भारत और बाहर के बुद्धिजीवियों को बाइबिल और क़ुरआन के दंडविधान की वैसी ही छीछालेदर करते हुए देखा जैसी मनुस्मृति के दंडविधान की की गई है? मनुस्मृति पूजा प्रकारों की सर्वथा उपेक्षा करती है क्योंकि वह राज्य को थियोलॉजिकल पोजीशन लेते हुए नहीं देखना चाहती। वह उपासना प्रकार या प्रक्रिया को किसी के पर्सनल अंत:करण का विषय मानती है और सच्चे अर्थों में सेकुलर है। सच्ची धार्मिक स्वतंत्रता यही है।
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं।

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