Maha Shivratri Special, माथे पर त्रिपुंड बनाने की विधि, साइज और मंत्र

Updesh Awasthee
आज महाशिवरात्रि है। पूरे भारत में महाशिवरात्रि का उत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। आज के दिन भारत में करोड़ों लोग अपने माथे पर त्रिपुंड बनाते हैं। इस प्रकार वह भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि त्रिपुंड बनाने की अपनी एक विधि होती है। त्रिपुंड का अपना एक आकार होता है और माथे पर त्रिपाठी लगाते समय एक विशेष मंत्र का उच्चारण किया जाता है। आज जब आप त्रिपुंड लगा ही रहे हैं तो विधिपूर्वक लगाइए। विधि में बता देता हूं:- 

त्रिपुण्ड्र बनाने की विधि एवं आकार और मंत्र

मध्य की तीन अंगुलियों से चंदन अथवा भस्म लेकर भक्तिपूर्वक मंत्रोच्चार के साथ बाएं नेत्र से दाएं नेत्र की ओर लगाना चाहिए। यदि त्रिपुंड मन्त्र ज्ञात न हो तो ॐ नमः शिवाय कह कर त्रिपुण्ड्र धारण किया जाना चाहिए। इसका आकार बाए नेत्र से दाएं नेत्र तक ही होना चाहिए। अधिक लंबा त्रिपुण्ड्र तप का और अधिक छोटा त्रिपुण्ड आयु का क्षय करता है। 

त्रिपुंड का मंत्र - ॐ त्रिलोकिनाथाय नम:

त्रिपुंड में तीन रेखाएं क्यों होती है 

शिवमहापुराण के अनुसार त्रिपुंड की तीन रेखाओं में से हर एक में नौ-नौ देवता निवास करते हैं।
1- अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रियाशक्ति, प्रात:स्वन तथा महादेव- ये त्रिपुंड की पहली रेखा के नौ देवता हैं।
2- ऊंकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा और महेश्वर- ये त्रिपुंड की दूसरी रेखा के नौ देवता हैं।
3- मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीयसवन तथा शिव- ये त्रिपुंड की तीसरी रेखा के नौ देवता हैं। 

त्रिपुंड का महत्व 

माथे पर जहां त्रिपुंड धारण किया जाता है वह पीनियल ग्रन्थि का स्थान होता है। पीनियल ग्रंथि (जिसे पीनियल पिंड, एपिफ़ीसिस सेरिब्रि, एपिफ़ीसिस या "तीसरा नेत्र" भी कहा जाता है) पृष्ठवंशी मस्तिष्क में स्थित एक छोटी-सी अंतःस्रावी ग्रंथि है। यह सेरोटोनिन व्युत्पन्न मेलाटोनिन को पैदा करती है, जोकि जागने/सोने के ढर्रे तथा मौसमी गतिविधियों का नियमन (रेगुलेशन) करने वाला हार्मोन है। चंदन का त्रिपुंड लगाने से पीनियल ग्रन्थि के दोष समाप्त हो जाते हैं। पीनियल ग्रन्थि के दोष ज्यादातर ऐसे लोगों में पाए जाते हैं जो तनाव की स्थिति में और मौसम के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। यानी इस प्रकार के लोगों को त्रिपुंड जरूर धारण करना चाहिए फिर चाहे वह शिव की भक्ति करें या ना करें। 

नारद पुराण में कर्म के अनुसार तिलक का निर्धारण 

नारद पुराण में उल्लेख आया है-
1. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र,
2. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड,
3. वैश्य को अर्धचन्द्र,
4. अन्य को वर्तुलाकार 
तिलक धारण करना चाहिए। आप यह मान सकते हैं कि इस प्रकार से नारद मुनि ने व्यक्तियों की कर्म के आधार पर पहचान का निर्धारण किया था। यहां नोट कीजिए कि यह जाति के आधार पर नहीं है। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article. लेखक - आचार्य कमलांश (ज्योतिष शोधार्थी)। 
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